छत्तीसगढ़
एक घंटा पहले
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न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति के मामलों में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किया है। अदालत ने अपने हालिया फैसले में यह स्थापित किया है कि वैवाहिक स्थिति या लिंग के आधार पर किसी भी महिला को उसके पारिवारिक अधिकारों से बेदखल नहीं किया जा सकता है। न्यायमूर्तियों ने साफ तौर पर कहा कि शादी के बाद भी बेटी या बहन का अपने मायके से रिश्ता खत्म नहीं होता और उन्हें अनुकंपा नियुक्ति पाने का पूरा अधिकार है।
क्या था पूरा मामला
यह कानूनी लड़ाई लोक अभियोजन अधिकारी दुर्गेश मिश्रा की विवाहित बहन द्वारा दायर एक याचिका के बाद शुरू हुई थी। याचिकाकर्ता ने अपने भाई की मृत्यु के बाद अनुकंपा नियुक्ति के लिए प्रशासन के पास आवेदन किया था, लेकिन अधिकारियों ने उसे केवल इस आधार पर खारिज कर दिया कि वह विवाहित है। इस मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट के जस्टिस संजय के. अग्रवाल की सिंगल बेंच ने प्रशासन के रुख को पूरी तरह से गलत माना।
समानता के अधिकार का उल्लंघन
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि विवाहित होने के कारण किसी बेटी को नौकरी से वंचित करना संविधान द्वारा दिए गए समानता के अधिकार के खिलाफ है। कोर्ट ने इसे स्पष्ट रूप से असंवैधानिक करार दिया है। न्यायाधीश ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई सरकारी कर्मचारी अविवाहित है और उसकी मृत्यु हो जाती है, तो उसकी शादीशुदा बहन अनुकंपा नियुक्ति की बराबर की दावेदार है। अदालत ने प्रशासन को सख्त निर्देश दिए हैं कि वे इस मामले में 4 सप्ताह के भीतर नियमों के दायरे में रहकर नए सिरे से विचार करें और सकारात्मक आदेश जारी करें।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी लिया हवाला
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व के निर्णयों का संदर्भ देते हुए कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का मूल उद्देश्य ही यही है कि सरकारी कर्मचारी की अचानक मृत्यु के बाद उसके आश्रितों और जरूरतमंद परिवार को तत्काल आर्थिक सहारा मिल सके। यदि कोई विवाहित बेटी या बहन अपने परिवार की जिम्मेदारी संभाल रही है और घर का सहारा बनी हुई है, तो केवल उसकी शादी होने की वजह से उसे इस अधिकार से दूर नहीं किया जा सकता। यह फैसला राज्य के हजारों परिवारों के लिए एक बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है।
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