पशु स्वास्थ्य: क्या मानसून में भीगने से मवेशियों को हो सकता है निमोनिया? जानिए विशेषज्ञ की सलाह बिहार एक महीने पहले 49
बरसात के मौसम में पशुओं के स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देने की जरूरत होती है। पशु चिकित्सा विशेषज्ञ का कहना है कि लगातार बारिश में भीगने से मवेशियों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है, जिससे उनमें निमोनिया का खतरा बढ़ जाता है।

मानसून और पशुओं का स्वास्थ्य

बरसात का मौसम आते ही वातावरण में नमी बढ़ जाती है, जिसका सीधा असर मनुष्यों के साथ-साथ पशुओं के स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। अक्सर लोग यह सोचते हैं कि क्या इंसानों की तरह ही मवेशियों को भी सर्दी, खांसी या निमोनिया जैसी बीमारियां हो सकती हैं? इस सवाल का जवाब स्पष्ट है कि हां, पशु भी इन बीमारियों की चपेट में आ सकते हैं। इस विषय पर अधिक जानकारी के लिए हमने पशु चिकित्सा विज्ञान विशेषज्ञ डॉ. विपिन कुमार से विशेष बातचीत की। उन्होंने बताया कि बरसात के दौरान मवेशियों का खास ख्याल रखना बेहद जरूरी है, अन्यथा उनकी जान को भी खतरा हो सकता है।

क्यों खतरनाक है बारिश में भीगना?

डॉ. विपिन कुमार ने विस्तार से समझाया कि यदि कोई पशु लगातार 5 से 6 घंटे तक बारिश में भीगता रहता है, तो उसके शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली यानी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर पड़ने लगती है। विशेषज्ञ के अनुसार, जब कोई पशु करीब 4 घंटे या उससे अधिक समय तक भीगता है, तो उसके शारीरिक तापमान में गिरावट आने लगती है और वह संक्रमण की चपेट में आसानी से आ जाता है। जब पशु की इम्युनिटी कमजोर होती है, तो हानिकारक बैक्टीरिया और अन्य कीटाणु उनके शरीर पर तेजी से हमला करते हैं, जो अंततः निमोनिया का रूप ले लेते हैं। यही कारण है कि बरसात के दिनों में पशुओं में निमोनिया के मामलों में भारी उछाल देखा जाता है।

संक्रमण की चपेट में आने वाले पशु

विशेषज्ञ ने आगाह किया कि सभी पशुओं में संक्रमण का खतरा बराबर नहीं होता। विशेष रूप से छोटे बछड़े और वे पशु जिन्हें समय पर कृमिनाशक या डी-वॉर्मिंग की दवा नहीं दी गई है, वे इस बीमारी के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। जिन पशुओं में पहले से ही आंतरिक परजीवियों का प्रकोप होता है, उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता पहले से ही काफी कम होती है। ऐसे में बारिश के दौरान निमोनिया उन्हें बहुत जल्दी अपना शिकार बना लेता है।

कैसे पहचानें निमोनिया के लक्षण?

डॉ. विपिन कुमार ने निमोनिया के लक्षणों को पहचानने के महत्वपूर्ण तरीके बताए हैं। यदि आपका पशु निम्नलिखित संकेतों को दिखाता है, तो उसे हल्के में बिल्कुल न लें:

  • पशु को 106 डिग्री फारेनहाइट तक तेज बुखार आ सकता है।
  • नाक से लगातार स्राव या पानी बहना।
  • पशु का स्वभाव सुस्त हो जाना और सामान्य गतिविधियों में कमी आना।
  • चारा और दाना खाना पूरी तरह बंद कर देना।
  • सांस लेने में अत्यधिक तकलीफ महसूस करना या सांस फूलना।

उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि इनमें से कोई भी लक्षण पशु में दिखाई दे, तो उपचार में एक पल की भी देरी नहीं करनी चाहिए। सही समय पर पशु चिकित्सक से परामर्श लेने से बीमारी को गंभीर रूप लेने से रोका जा सकता है।

बचाव के उपाय और सुझाव

पशुपालकों को सलाह दी गई है कि वे मानसून के दौरान अपने मवेशियों की सुरक्षा के लिए निम्नलिखित कदम उठाएं:

  • पशुओं को लंबे समय तक बारिश में भीगने से बचाएं और उन्हें किसी सुरक्षित व सूखे आश्रय स्थल में रखें।
  • पशुओं के रहने की जगह को हर समय साफ और सूखा रखें, ताकि बैक्टीरिया पनप न सकें।
  • नियमित अंतराल पर पशुओं को कृमिनाशक दवा जरूर दें, ताकि उनकी प्रतिरोधक क्षमता मजबूत बनी रहे।
  • लक्षण दिखते ही बिना किसी घरेलू नुस्खे के चक्कर में पड़े, तुरंत नजदीकी पशु चिकित्सालय में संपर्क करें।

डॉ. विपिन कुमार ने अंत में जोर दिया कि समय पर इलाज ही पशुओं को बचाने का सबसे कारगर तरीका है। इसके अलावा, किसी भी प्रकार की अधिक जानकारी या सहायता के लिए पशुपालक अपने नजदीकी जिला पशुपालन विभाग या स्थानीय पशु चिकित्सा केंद्र की मदद ले सकते हैं।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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