विधान परिषद चुनाव में सीट बंटवारे से बाहर रहे दीपक प्रकाश, खतरे में मंत्री पद; जानिए 10वीं सीट का पूरा गणित बिहार एक घंटा पहले 2
बिहार विधान परिषद की 10 में से 9 सीटों पर एनडीए ने उम्मीदवार घोषित कर दिए, लेकिन सम्राट चौधरी सरकार के मंत्री और उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश को जगह नहीं मिली। माना जा रहा है कि 8 जून को नामांकन की आखिरी तारीख खत्म होते ही उनकी कुर्सी जा सकती है।

बिहार विधान परिषद की 10 सीटों में से 9 सीटों पर नियमित चुनाव हो रहा है, जबकि एक सीट पर उपचुनाव होना है। इन्हीं में से एनडीए ने अब तक 10 में से 9 सीटों पर अपने प्रत्याशियों के नामों का ऐलान कर दिया है। हैरानी की बात यह रही कि इस सूची में सम्राट चौधरी सरकार के मंत्री और उपेंद्र कुशवाहा के पुत्र दीपक प्रकाश का नाम शामिल नहीं है। राजनीतिक गलियारों में इसे राष्ट्रीय लोक मोर्चा के लिए बड़े झटके के तौर पर देखा जा रहा है।

किस दल के खाते में गईं कितनी सीटें

एनडीए ने जिन 9 सीटों के लिए प्रत्याशी तय किए हैं, उनमें 4 सीटें भाजपा, 4 सीटें जेडीयू और 1 सीट लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के हिस्से में आई हैं। इस बंटवारे में राष्ट्रीय लोक मोर्चा को एक भी सीट न मिलने से राजनीतिक अटकलों का बाजार गर्म हो गया है।

दरअसल, विधायकों के संख्याबल के आधार पर एनडीए के लिए पूरी तरह सुरक्षित मानी जा रही इन 9 सीटों में से किसी पर भी दीपक प्रकाश को मौका नहीं दिया गया। चूंकि वे फिलहाल बिहार विधानमंडल के किसी भी सदन यानी विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य नहीं हैं, इसलिए सूची में नाम न होने के बाद अब उन्हें अपने मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ सकता है।

मैदान में उतरे दिग्गज चेहरे

इस चुनावी मुकाबले के लिए भाजपा और जेडीयू ने अपने-अपने चार-चार उम्मीदवारों की सूची जारी की है। भाजपा की ओर से सबसे चौंकाने वाला नाम भोजपुरी फिल्म स्टार पवन सिंह का है। पवन सिंह के अलावा भाजपा ने अपने राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. संजय मयूख, अनिल कुमार ठाकुर और शीला पंडित को भी टिकट दिया है। वहीं जेडीयू ने भी चार मजबूत चेहरों को आगे किया है, जबकि चिराग पासवान की पार्टी लोजपा (रामविलास) ने अशर अंसारी को अपना प्रत्याशी बनाया है।

इस सूची के सामने आने के बाद यह साफ है कि एनडीए ने जातीय समीकरणों को साधने की भरपूर कोशिश की है, मगर इस फेरबदल में दीपक प्रकाश हाशिए पर चले गए।

विधायकों की संख्या और 10वीं सीट का पेच

बिहार विधानसभा के मौजूदा संख्याबल के मुताबिक विधान परिषद की एक सीट जीतने के लिए कम से कम 25 विधायकों के प्रथम वरीयता के वोट चाहिए। इस लिहाज से एनडीए के पास अपने कुल विधायकों के दम पर 9 उम्मीदवारों को बिना किसी विरोध के आसानी से जिताने का पर्याप्त बहुमत है, इसीलिए इन्हें पूरी तरह सुरक्षित सीट माना जा रहा था।

बाकी बची 1 सीट पर महागठबंधन, खासकर राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) का मजबूत दावा है और राजद इस सीट पर अपना प्रत्याशी उतारने की तैयारी में है। तकनीकी रूप से देखें तो यदि एनडीए इस 10वीं सीट पर अपना कोई उम्मीदवार खड़ा करता है, तभी मतदान की नौबत आएगी। लेकिन विपक्षी खेमे के दावे वाली इस सीट पर एनडीए के पास अतिरिक्त वोट नहीं हैं, इसी वजह से उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी इस पर कोई जोखिम नहीं लेना चाहेगी।

क्यों खतरे में है मंत्री की कुर्सी

संवैधानिक नियमों के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य नहीं है, तो वह शपथ ग्रहण की तारीख से अधिकतम 6 महीने तक ही मंत्री पद पर बना रह सकता है। इन्हीं 6 महीने की अवधि के भीतर उसे किसी एक सदन की सदस्यता हासिल करना अनिवार्य होता है।

दीपक प्रकाश के लिए यह समयसीमा अब लगभग खत्म होने के कगार पर है। विधायकों के वोट के लिहाज से सुरक्षित मानी जा रही 9 सीटों में जगह न मिलने के कारण अब उनका सदन में पहुंचना नामुमकिन हो गया है। राजनीति के जानकारों का साफ कहना है कि 8 जून को नामांकन की आखिरी तारीख खत्म होते ही दीपक प्रकाश का नीतीश कैबिनेट से बाहर होना पूरी तरह तय हो जाएगा।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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