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एक घंटा पहले
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पासपोर्ट और नागरिकता पर उपजे विवाद में शशि थरूर की एंट्री
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद शशि थरूर ने हाल ही में पासपोर्ट और नागरिकता से जुड़े सरकारी स्पष्टीकरण पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। केंद्र सरकार द्वारा जारी उस आदेश को उन्होंने कानूनी विरोधाभास करार दिया है, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि भारतीय पासपोर्ट को कभी भी नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता है। शशि थरूर का मानना है कि सरकारी नीति और जमीनी हकीकत के बीच के इस भ्रम को खत्म करने के लिए कानून में तत्काल व्यावहारिक बदलावों की आवश्यकता है।
सोशल मीडिया पर उठाई आवाज
शशि थरूर ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स के माध्यम से विदेश मंत्रालय की उस टिप्पणी को घेरा है, जिसमें यह कहा गया कि भारतीय पासपोर्ट मूल रूप से केवल एक यात्रा दस्तावेज है, न कि नागरिकता का कोई ठोस सबूत। थरूर ने माना कि सरकार ने यह रुख पासपोर्ट अधिनियम, 1967 की धारा 20 के तहत लिया है, लेकिन उन्होंने आम नागरिकों के नजरिए से इस तर्क को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। उनके अनुसार, सामान्य जनता के लिए यह स्पष्टीकरण किसी बड़े विरोधाभास से कम नहीं है।
पुलिस सत्यापन के बावजूद क्यों खड़ा है सवाल?
थरूर ने तर्क दिया कि दशकों से भारतीय पासपोर्ट को सरकारी पहचान का एक विश्वसनीय और प्रमुख दस्तावेज माना जाता रहा है। पासपोर्ट जारी करने की प्रक्रिया के दौरान कड़ा पुलिस सत्यापन और विस्तृत दस्तावेजों की जांच की जाती है। ऐसे में यह तर्क देना कि इतनी गहन छानबीन के बाद प्राप्त दस्तावेज नागरिकता साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है, तर्कहीन लगता है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का भी जिक्र किया, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि आधार कार्ड केवल पहचान और निवास का प्रमाण हो सकता है, लेकिन यह नागरिकता का आधार नहीं है। थरूर का मानना है कि वर्तमान में बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जिनके पास सरकार द्वारा अधिकृत दस्तावेज तो हैं, लेकिन उनमें से कोई भी नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जाता।
समस्या के समाधान के लिए दिए दो अहम सुझाव
इस पूरे कानूनी पचड़े को सुलझाने के लिए शशि थरूर ने सरकार के सामने दो व्यावहारिक सुझाव रखे हैं:
- कानूनी संशोधन: पासपोर्ट और आधार कार्ड दोनों को भारतीय नागरिकता का अंतिम प्रमाण माना जाना चाहिए, जब तक कि सरकार द्वारा इन्हें आधिकारिक तौर पर रद्द या वापस न लिया जाए।
- यूआईडीएआई की भूमिका: भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) को उन निवासियों के लिए एक अलग प्रकार का पहचान पत्र या आधार जारी करना चाहिए जो भारत के नागरिक नहीं हैं। इससे नागरिकों और गैर-नागरिकों के बीच पहचान का स्पष्ट अंतर बना रहेगा।
सरकारी रुख और पासपोर्ट अधिनियम की स्थिति
गौरतलब है कि विदेश मंत्रालय ने हाल ही में स्पष्ट किया था कि पासपोर्ट मुख्य रूप से केवल यात्रा के काम आता है। सरकार ने अपने बचाव में पासपोर्ट अधिनियम, 1967 की धारा 20 का हवाला दिया है। इस धारा के अनुसार, सार्वजनिक हित में केंद्र सरकार गैर-नागरिकों को भी यात्रा दस्तावेज या पासपोर्ट जारी करने का अधिकार रखती है। इसके अलावा, सरकार ने बॉम्बे हाई कोर्ट के वर्ष 2013 के उन फैसलों का भी उल्लेख किया है, जिनमें यह स्पष्ट किया गया था कि केवल पासपोर्ट का होना ही किसी व्यक्ति की नागरिकता साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इस पूरी स्थिति पर अब शशि थरूर की प्रतिक्रिया ने बहस को और अधिक गरमा दिया है।
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