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एक घंटा पहले
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सावन और शिव भक्ति का महत्व
भगवान शिव का सबसे प्रिय माह सावन चल रहा है और इस दौरान देशभर के शिव मंदिरों में भक्तों का तांता लगा हुआ है। भक्त भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए पूरी श्रद्धा के साथ पूजा-अर्चना कर रहे हैं। मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव बहुत भोले हैं और वे मात्र एक लोटा जल से भी अपने भक्तों पर कृपा बरसाते हैं। हालांकि, शिव पूजा के कुछ नियम हैं जिनका पालन करना अत्यंत आवश्यक माना जाता है। भक्त अक्सर शिवलिंग पर बेलपत्र, धतूरा, आक के फूल और भांग जैसी पवित्र वस्तुएं अर्पित करते हैं, लेकिन कुछ ऐसी चीजें भी हैं जिन्हें शिवलिंग पर चढ़ाना शास्त्रों में पूरी तरह निषेध बताया गया है। इन्हीं में से एक है केतकी का फूल।
क्यों वर्जित है केतकी का फूल
उज्जैन के प्रख्यात ज्योतिषाचार्य आनंद भारद्वाज के अनुसार, शिव पूजा में केतकी के फूल का इस्तेमाल न करने के पीछे एक पौराणिक कथा है, जो भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के बीच हुए विवाद और उसके बाद भगवान शिव के क्रोध से जुड़ी है। धार्मिक ग्रंथों, विशेषकर शिव पुराण में इस घटना का विस्तार से उल्लेख मिलता है। यह कथा सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा और पालनहार विष्णु के बीच श्रेष्ठता के विवाद से शुरू होती है।
श्रेष्ठता का विवाद और शिवलिंग की उत्पत्ति
पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक समय भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के बीच इस बात को लेकर गंभीर मतभेद हो गया कि दोनों में सबसे श्रेष्ठ कौन है। यह विवाद जब बढ़ने लगा, तो इसका समाधान खोजने के लिए वे भगवान शिव के पास पहुंचे। महादेव ने अपनी दिव्य शक्तियों से एक विशाल और अनंत शिवलिंग को प्रकट किया। भगवान शिव ने ब्रह्मा और विष्णु को चुनौती दी कि जो भी इस शिवलिंग का आदि और अंत ढूंढ लेगा, वही सर्वश्रेष्ठ माना जाएगा। इस चुनौती को स्वीकार करते हुए दोनों देव अलग-अलग दिशाओं में निकल पड़े। भगवान विष्णु ने ऊपर की ओर प्रस्थान किया, जबकि भगवान ब्रह्मा ने नीचे की दिशा में खोज शुरू की। अथक प्रयासों के बावजूद, दोनों ही देव शिवलिंग का आदि और अंत खोजने में असफल रहे।
ब्रह्माजी का असत्य और केतकी की गवाही
विष्णुजी ने अपनी हार स्वीकार कर ली और महादेव के समक्ष नतमस्तक होकर अपनी पराजय मान ली, जिससे भगवान शिव की सर्वोच्चता सिद्ध हुई। वहीं दूसरी ओर, ब्रह्माजी को अपनी प्रतिष्ठा जाने का डर सताने लगा। मार्ग में उन्हें एक केतकी का फूल मिला। अपनी बात को सिद्ध करने के लिए ब्रह्माजी ने केतकी के फूल को अपने पक्ष में झूठी गवाही देने के लिए राजी कर लिया। इसके बाद ब्रह्माजी ने भगवान शिव के पास जाकर दावा किया कि उन्होंने शिवलिंग का अंत ढूंढ लिया है और केतकी का फूल इसका प्रमाण है। भगवान शिव अंतर्यामी थे और उन्हें सत्य का ज्ञान था।
भगवान शिव का क्रोध और श्राप
ब्रह्माजी द्वारा बोला गया झूठ सुनकर महादेव अत्यंत क्रोधित हुए। उन्होंने तुरंत ब्रह्माजी का पांचवां सिर काट दिया और झूठ में साथ देने के कारण केतकी के फूल को भी दंडित किया। भगवान शिव ने केतकी के फूल को शाप दिया कि उनकी किसी भी पूजा में कभी भी केतकी के फूल का प्रयोग नहीं किया जाएगा। यही कारण है कि आज भी शिव भक्त शिवलिंग पर बेलपत्र, धतूरा और अन्य प्रिय पुष्प तो चढ़ाते हैं, लेकिन केतकी का फूल अर्पित करने से पूरी तरह बचते हैं। शास्त्रों में इसे वर्जित माना गया है, इसलिए सावन के इस पावन पर्व पर पूजा करते समय इन नियमों का विशेष ध्यान रखना चाहिए ताकि महादेव की पूर्ण कृपा प्राप्त हो सके।
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