11 अगस्त 1947: बीकानेर रियासत के लिए जिन्ना और माउंटबेटन की बिसात, गांधीजी पर उठे थे गंभीर सवाल भारत एक घंटा पहले 5
देश की आजादी से मात्र चार दिन पहले का दिन उथल-पुथल भरा रहा, जहां एक तरफ बीकानेर के विलय को लेकर राजनीतिक चालें चली जा रही थीं, वहीं दूसरी ओर कोलकाता में महात्मा गांधी पर भेदभाव के आरोप लग रहे थे।

कोलकाता में गांधीजी की सफाई

आजादी मिलने के ठीक चार दिन पहले यानी 11 अगस्त 1947 की तारीख भारतीय इतिहास में काफी गहमागहमी वाली रही। उस दिन कोलकाता में मौजूद महात्मा गांधी को लेकर लोगों के बीच काफी नाराजगी और सवाल थे। कोलकाता के एक आश्रम में आयोजित प्रार्थना सभा के दौरान कुछ लोगों ने महात्मा गांधी पर पक्षपात का गंभीर आरोप लगाया। लोगों का कहना था कि प्रार्थना सभा में धनवान हस्तियों और प्रमुख नेताओं को तो आगे की कतार में बैठने की जगह दी जाती है, लेकिन एक आम आदमी को वहां जगह मिलना मुश्किल हो जाता है।

इन आरोपों से महात्मा गांधी काफी व्यथित थे और उन्होंने अपनी प्रार्थना सभा के दौरान इस मुद्दे पर खुलकर बात की। गांधीजी ने अपनी बात रखते हुए कहा कि मेरे पास कुछ सवाल लाए गए हैं जिनका जवाब देना मेरा कर्तव्य है। उन्होंने सफाई देते हुए कहा कि रविवार होने के कारण भीड़ काफी अधिक थी, जिस वजह से ऐसी स्थिति बनी होगी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मैंने अपने स्वयंसेवकों और कार्यकर्ताओं को स्पष्ट निर्देश दे दिए हैं कि आगे से किसी भी व्यक्ति के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए।

बीकानेर रियासत को लेकर राजनीतिक बिसात

वहीं दूसरी तरफ, बीकानेर की रियासत को भारत में शामिल करने के लिए मोहम्मद अली जिन्ना और लॉर्ड माउंटबेटन के बीच शह-मात का खेल चल रहा था। 11 अगस्त का पूरा दिन भारत और पाकिस्तान के बंटवारे और रियासतों के झुकाव को समझने के इर्द-गिर्द घूमता रहा। जिन्ना ने बीकानेर को अपनी ओर खींचने की पूरी कोशिश की थी, लेकिन लॉर्ड माउंटबेटन ने भी अपने तरीके से जवाबी चालें चलनी शुरू कर दी थीं।

उस समय की राजनीतिक स्थितियों को देखते हुए यह कयास लगाए जा रहे थे कि कौन सी रियासत किस तरफ जाएगी। हालांकि, शाम होते-होते बीकानेर रियासत का रुख साफ होने लगा था और बीकानेर के भारत में शामिल होने की प्रबल संभावना बन गई थी। 11 अगस्त 1947 का घटनाक्रम इस बात का गवाह है कि कैसे एक तरफ सांप्रदायिक दंगों के बीच गांधीजी अपनी नैतिकता और पारदर्शिता को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे थे, तो दूसरी तरफ देश की भौगोलिक सीमाओं को तय करने के लिए पर्दे के पीछे बड़ी कूटनीतिक चालें चली जा रही थीं। यह दिन भारत के भविष्य को आकार देने वाले उन आखिरी दस दिनों का एक अहम हिस्सा था, जो देश की आजादी की नींव तैयार कर रहे थे।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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