पाली का अनूठा रंगरेज हुनर: आधुनिकता के दौर में भी सिगड़ी और भगोले से बरकरार है पारंपरिक रंगाई की चमक राजस्थान 2 घंटे पहले 4
राजस्थान के पाली में उदयपुरिया बाजार के रंगरेज आज भी अपनी सदियों पुरानी पारंपरिक विधि से कपड़ों को रंग रहे हैं, जिसे वे सिगड़ी और भगोले का उपयोग करके तैयार करते हैं।

परंपरा और आधुनिकता का संगम

राजस्थान की सांस्कृतिक धरोहर में पाली के रंगरेज समाज का नाम विशेष रूप से लिया जाता है। बदलते समय और आधुनिक मशीनों की चकाचौंध के बीच भी पाली के कारीगरों ने अपनी पुश्तैनी कला को पूरी शिद्दत के साथ जीवित रखा है। उदयपुरिया बाजार में आज भी इन कारीगरों की धाक है, जहां आधुनिक तकनीक के बजाय देसी तरीके से कपड़ों की रंगाई की जाती है। यह हुनर केवल एक व्यवसाय नहीं, बल्कि एक विरासत है जो पीढ़ियों से चली आ रही है और आज भी लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है।

सिगड़ी और भगोले का जादुई इस्तेमाल

पाली के इन रंगरेजों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी रंगाई की प्रक्रिया है। जहाँ आज के दौर में रसायनों और स्वचालित मशीनों का बोलबाला है, वहीं यहाँ के कारीगर आज भी मिट्टी या लोहे की सिगड़ी पर बड़े भगोले चढ़ाकर रंग तैयार करते हैं। सिगड़ी की धीमी और नियंत्रित आंच पर रंगों को पकाना एक कठिन और धैर्यपूर्ण काम है। कारीगरों का मानना है कि सही तापमान और रंगों का सटीक अनुपात ही वह राज़ है जो इन कपड़ों को लंबे समय तक पक्का और चमकदार बनाए रखता है। यही कारण है कि यहाँ रंगे गए साफे, चुनरी और लहरिया आज भी अपनी गुणवत्ता के लिए पूरे देश में मशहूर हैं।

पुराने कपड़ों में भर देते हैं नई जान

इन कारीगरों का कौशल केवल नए कपड़ों को रंगने तक ही सीमित नहीं है। इनकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये फीके पड़ चुके या पुराने कपड़ों को भी फिर से नया जैसा बना सकते हैं। अपने गुप्त और विशेष रंग मिश्रण के फॉर्मूले का उपयोग करके ये कारीगर पुराने कपड़ों पर ऐसी चमक बिखेर देते हैं कि उन्हें देखकर कोई नहीं कह सकता कि वे कपड़े पुराने हैं। इनकी इस कुशलता की चर्चा केवल स्थानीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि विदेशों में रहने वाले प्रवासी भारतीयों के बीच भी होती है। बहुत से लोग अपने कीमती लेकिन रंग खो चुके कपड़ों को नया जीवन देने के लिए इनके पास विशेष रूप से लाते हैं।

हाई प्रोफाइल शादियों में रहती है मांग

पाली के रंगरेजों की कला की मांग देश के बड़े महानगरों में होने वाली हाई प्रोफाइल शादियों और शाही आयोजनों में जबरदस्त रहती है। चाहे कोई सांस्कृतिक कार्यक्रम हो या पारंपरिक विवाह समारोह, विशेष साफा बांधने और कपड़ों की पक्की रंगाई के लिए इन कारीगरों को विशेष रूप से आमंत्रित किया जाता है। उदयपुरिया बाजार में भले ही अब गिने-चुने परिवार ही इस पारंपरिक व्यवसाय को संभाल रहे हैं, लेकिन उनके हुनर की चमक में कोई कमी नहीं आई है। मेहनत, समर्पण और परंपरा के प्रति निष्ठा ही वह कारण है जिसके चलते आज भी पाली के रंगरेजों द्वारा तैयार किए गए कपड़ों की मांग बरकरार है। उनकी कला न केवल राजस्थान की समृद्ध संस्कृति को प्रदर्शित करती है, बल्कि यह भी बताती है कि जड़ें कितनी भी पुरानी क्यों न हों, सही कलाकारी के दम पर उन्हें आज भी प्रासंगिक बनाए रखा जा सकता है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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