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एक घंटा पहले
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पाकिस्तान के सियासी गलियारे से इस वक्त की सबसे बड़ी खबर सामने आ रही है। देश के पूर्व प्रधानमंत्री और पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ के प्रमुख इमरान खान के इलाज को लेकर चल रही कानूनी जंग में शहबाज शरीफ सरकार को एक बार फिर करारा झटका लगा है। पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने इमरान खान को जेल से अस्पताल स्थानांतरित करने के अपने फैसले के खिलाफ दायर की गई सरकार की पुनर्विचार याचिका को वापस लौटा दिया है। इस्लामाबाद के चीफ कमिश्नर की ओर से दायर इस याचिका पर सुनवाई करने से कोर्ट ने साफ इनकार कर दिया है, जिससे सरकार की मुश्किलें काफी बढ़ गई हैं।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश और अस्पताल में इलाज की मंजूरी
यह पूरा मामला इमरान खान की सेहत और उनके इलाज के अधिकारों से जुड़ा हुआ है। बीते 18 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने एक बड़ा और महत्वपूर्ण आदेश दिया था। इस आदेश के तहत कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया था कि इमरान खान को तुरंत रावलपिंडी की बेहद सुरक्षित मानी जाने वाली अड्याला जेल से निकालकर इस्लामाबाद के प्रसिद्ध शिफा इंटरनेशनल अस्पताल में भर्ती कराया जाए। अदालत का उद्देश्य यह था कि वहां उनके स्वास्थ्य की गहन जांच हो सके और उन्हें सही इलाज मिल सके।
अदालत ने सिर्फ अस्पताल भेजने का ही आदेश नहीं दिया था, बल्कि उनके इलाज की निगरानी के लिए एक विशेष मेडिकल बोर्ड गठित करने का भी निर्देश दिया था। इस मेडिकल बोर्ड में विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ डॉक्टरों के साथ-साथ इमरान खान के निजी चिकित्सक को भी शामिल करने की बात कही गई थी ताकि इलाज में पूरी पारदर्शिता बनी रहे। सुप्रीम कोर्ट ने इमरान खान को आगामी 16 सितंबर तक अस्पताल में रहने और वहां अपना इलाज कराने की अनुमति दी थी। शहबाज शरीफ सरकार को कोर्ट का यह फैसला नागवार गुजरा और उसने तुरंत इसके खिलाफ कानूनी मोर्चा खोल दिया।
तकनीकी खामियों के कारण वापस हुई सरकार की याचिका
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को चुनौती देने के लिए इस्लामाबाद के चीफ कमिश्नर की ओर से एडवोकेट जनरल नवीद हयात मलिक के माध्यम से एक पुनर्विचार याचिका दायर की गई थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री ने इस याचिका को स्वीकार करने के बजाय इसे वापस लौटा दिया। याचिका खारिज होने के पीछे मुख्य रूप से कुछ तकनीकी और प्रशासनिक कारण रहे हैं।
अदालत की रजिस्ट्री के अनुसार, सरकार की ओर से पेश किए गए कानूनी दस्तावेजों में कई कमियां थीं। याचिका के साथ लगाए गए कागजात पूरी तरह से व्यवस्थित नहीं थे और पेपर बुक्स अधूरी पाई गईं। इस वजह से कोर्ट ने याचिका को बिना सुनवाई के ही वापस कर दिया। अब अगर सरकार इस आदेश को दोबारा चुनौती देना चाहती है, तो चीफ कमिश्नर को पहले इन सभी कानूनी आपत्तियों और कमियों को दूर करना होगा और फिर नए सिरे से याचिका दाखिल करनी होगी। इस तकनीकी अड़चन के कारण सरकार की अपील अभी तक सुनवाई के स्तर तक भी नहीं पहुंच पाई है।
याचिका में सरकार ने क्या दिए थे तर्क?
शहबाज सरकार ने इस याचिका के जरिए सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश का कड़ा विरोध किया था। सरकार की ओर से अदालत में निम्नलिखित मुख्य तर्क पेश किए गए थे:
- सरकार का मानना था कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया यह अंतरिम आदेश वास्तव में इमरान खान को दी गई एक बड़ी अंतरिम राहत की तरह है और इसमें जेल नियमों की प्रक्रिया का पूरी तरह पालन नहीं हुआ है।
- याचिका में तर्क दिया गया कि इमरान खान को सीधे निजी अस्पताल भेजने की प्रक्रिया से जेल के स्थापित नियमों का उल्लंघन होता है।
- सरकारी वकीलों का कहना था कि किसी हाई-प्रोफाइल कैदी को इस तरह सीधे निजी अस्पताल में इलाज की अनुमति देने से जेल में बंद अन्य कैदियों के बीच भेदभाव की स्थिति पैदा होगी।
- सरकार के अनुसार, यह फैसला भविष्य के लिए एक गलत मिसाल कायम कर सकता है, जिससे अन्य कैदी भी इसी तरह की मांगों के साथ अदालत का रुख करेंगे।
साल 2023 से जेल में बंद हैं इमरान खान
गौरतलब है कि पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान साल 2023 से ही सलाखों के पीछे बंद हैं। जेल में होने के बावजूद वे देश के सबसे लोकप्रिय और प्रभावशाली विपक्षी नेता बने हुए हैं। हाल के दिनों में इमरान खान की सेहत को लेकर उनके परिवार के सदस्यों और उनकी पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ के नेताओं ने गहरी चिंता व्यक्त की है। विशेष रूप से उनकी आंखों में आ रही समस्याओं और अन्य शारीरिक तकलीफों को लेकर लगातार सवाल उठाए जा रहे थे।
इमरान खान के परिजनों और उनके कानूनी दल ने जेल प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा था कि जेल के भीतर उनके स्वास्थ्य का ठीक से ख्याल नहीं रखा जा रहा है और उन्हें आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं नहीं दी जा रही हैं। इन्हीं चिंताओं को ध्यान में रखते हुए मामला देश की सबसे बड़ी अदालत तक पहुंचा था, जिसने अंततः उन्हें अस्पताल भेजने का मानवीय फैसला सुनाया।
कानून मंत्री और सरकार का आधिकारिक पक्ष
इस पूरे विवाद के बीच शहबाज कैबिनेट में शामिल संघीय कानून मंत्री आजम नजीर तरार ने सरकार का रुख स्पष्ट किया है। उन्होंने मीडिया से बातचीत में कहा कि सरकार किसी भी तरह से इमरान खान को जरूरी चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने के खिलाफ नहीं है। सरकार का विरोध केवल उन्हें एक निजी अस्पताल में स्थानांतरित करने के तरीके को लेकर है।
कानून मंत्री का कहना है कि किसी भी कैदी को अस्पताल में भर्ती कराए जाने की प्रक्रिया पूरी तरह से जेल के नियमों और स्थापित मेडिकल प्रोटोकॉल के तहत ही होनी चाहिए। सरकार चाहती है कि इस मामले में किसी भी तरह का विशेष व्यवहार न किया जाए और सभी प्रक्रियाएं कानून के दायरे में रहकर पूरी की जाएं। फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट के इस रुख से शहबाज सरकार को राजनीतिक और कानूनी दोनों ही मोर्चों पर एक बड़ी असहजता का सामना करना पड़ रहा है।
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