क्या पाकिस्तान की सेना ने ही खरीद ली PIA? सरकारी एयरलाइन की बिक्री पर खड़ा हुआ बड़ा विवाद विश्व एक महीने पहले 60
पाकिस्तान इंटरनेशनल एयरलाइंस की बिक्री को लेकर सोशल मीडिया पर बड़े दावे किए जा रहे हैं कि यह पूरी तरह से सेना के नियंत्रण में चली गई है। सरकार के दावों और विपक्षी आलोचनाओं के बीच इस सौदे की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

पाकिस्तान में एयरलाइन सौदे पर मचे घमासान की असल कहानी

पाकिस्तान में कब क्या अजब स्थिति पैदा हो जाए, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। फिलहाल पाकिस्तान इंटरनेशनल एयरलाइंस यानी PIA की बिक्री का मुद्दा पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है। सरकार ने काफी लंबे समय तक चली मशक्कत के बाद इस सरकारी एयरलाइन को एक निजी कंपनी को सौंपने का दावा किया है। लेकिन इस बिक्री के बाद जो तथ्य सामने आए हैं, उन्होंने जनता और जानकारों के बीच एक बड़ा संदेह पैदा कर दिया है। सोशल मीडिया पर एक वर्ग का यह दावा तेजी से वायरल हो रहा है कि पाकिस्तान की सेना ने खुद ही इस एयरलाइन को खरीदा है। कहा जा रहा है कि एक ओर सरकार ने इसे मुफ्त में बेचने का काम किया, तो दूसरी ओर सेना ने इसे मुफ्त में हासिल कर लिया है।

सेना और सौदे के बीच क्या है कनेक्शन

पाकिस्तान के कई वरिष्ठ पत्रकारों ने भी इस सौदे को लेकर तीखी टिप्पणी की है। उनका तर्क है कि PIA की बिक्री प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और इसके शेयर भी ट्रांसफर कर दिए गए हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि इस एयरलाइन के नए चेयरमैन के रूप में फौजी फाउंडेशन के CEO को नियुक्त किया गया है। आलोचकों का मानना है कि सेना ने लोगों को गुमराह करने के लिए केवल नकली नामों और अलग-अलग कंपनियों का सहारा लिया है। सच्चाई यह है कि लगभग दो दशक की कोशिशों के बाद सरकार ने PIA को जिस निजी कंपनी को बेचा है, वह आरिफ हबीब कॉर्पोरेशन के निवेशकों के नेतृत्व में बनी एक संस्था है। इस प्रक्रिया में पीआईए इक्विटी लिमिटेड नाम की एक विशेष इकाई का गठन किया गया, जिसने पूरी कमान अपने हाथों में ले ली है।

विवाद का केंद्र: चेयरमैन की नियुक्ति

इस पूरे मामले में विवाद तब और बढ़ गया जब नए निदेशक मंडल के पहले चेयरमैन के रूप में लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) अनवर अली हैदर के नाम की घोषणा की गई। अनवर अली हैदर न केवल सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी हैं, बल्कि वे फौजी फाउंडेशन के मैनेजिंग डायरेक्टर भी हैं। इसी नियुक्ति ने सोशल मीडिया पर यह चर्चा छेड़ दी कि अप्रत्यक्ष रूप से PIA पर पाकिस्तान की सेना का पूरी तरह से कब्जा हो गया है। हालांकि, आधिकारिक रिकॉर्ड और दस्तावेजों में इस बात का उल्लेख है कि यह एयरलाइन किसी सरकारी सैन्य इकाई को नहीं, बल्कि एक निजी निवेशक समूह को बेची गई है। दिलचस्प यह है कि इस निवेशक ग्रुप में फौजी फर्टिलाइजर जैसी कंपनियां भी शामिल हैं, जिनका सीधा संबंध फौजी फाउंडेशन से जोड़कर देखा जाता है, जो अंततः सैन्य हितों से जुड़ी संस्था है।

कीमत को लेकर उठ रहे हैं तीखे सवाल

सौदे की कीमत और भुगतान का तरीका भी एक बड़े विवाद का विषय बना हुआ है। पाकिस्तान सरकार ने दावा किया है कि इस सौदे का कुल मूल्य करीब 180 अरब पाकिस्तानी रुपये है। हालांकि, आलोचकों का कहना है कि सरकार को शुरुआती चरण में नकद के रूप में केवल 10 अरब रुपये ही प्राप्त हुए हैं। विपक्ष और कई जानकारों का दावा है कि बाकी बची हुई बड़ी रकम को एयरलाइन के भविष्य में निवेश के रूप में दिखाया गया है, जिसका कोई ठोस आधार नहीं है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि यह सौदा एक तरह का दिखावा है और वास्तविकता में सेना ने ही अपनी जेब से इसे लगभग मुफ्त में हथिया लिया है।

सरकार का पक्ष बनाम विपक्षी दावा

दूसरी तरफ पाकिस्तान सरकार का अपना तर्क है। सरकार का दावा है कि इस निवेश का मुख्य उद्देश्य एयरलाइन का आधुनिकीकरण करना और इसकी सेवाओं को वैश्विक स्तर का बनाना है। अधिकारियों का मानना है कि इस नई पूंजी से भविष्य में नई उड़ानें शुरू होंगी और एयरलाइन के संचालन में सुधार आएगा। बावजूद इसके, जनता के बीच अविश्वास की स्थिति बनी हुई है। सोशल मीडिया पर लोग लगातार इसे एक 'फर्जी डील' करार दे रहे हैं, जिसमें आम जनता के नाम पर सरकारी संपत्ति को सेना की संस्थाओं के सुपुर्द कर दिया गया है। क्या यह वाकई एयरलाइन के पुनरुद्धार की दिशा में एक कदम है या फिर सत्ता और सैन्य गलियारों की मिलीभगत से लिया गया एक विवादास्पद फैसला, यह समय ही बताएगा।

साहिल चौहान पाबना के वर्ल्ड अफेयर्स रिपोर्टर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय खबरें और वैश्विक मामले कवर करते हैं। विदेश नीति, कूटनीति और दुनिया भर के घटनाक्रमों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे जटिल वैश्विक मुद्दों को भारतीय नजरिए से समझाते हैं।

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