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4 घंटे पहले
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विचारों
भारत का नया रक्षा मंत्र: आत्मनिर्भर हवाई सुरक्षा
भारत अब अपनी आसमान की सुरक्षा के लिए पूरी तरह से विदेशी तकनीक पर निर्भर नहीं रहना चाहता है। रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन यानी DRDO इस दिशा में एक बड़ा कदम उठा रहा है, जिसे प्रोजेक्ट कुशा का नाम दिया गया है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के जरिए भारत ऐसा स्वदेशी एयर डिफेंस सिस्टम तैयार कर रहा है, जो रूस से खरीदे गए S-400 सिस्टम को न केवल टक्कर देगा, बल्कि कई मामलों में उसे पीछे भी छोड़ सकता है। इस प्रणाली की सबसे बड़ी विशेषता इसका बहुस्तरीय सुरक्षा घेरा है, जो तीन अलग-अलग रेंज की मिसाइलों से लैस होगा।
प्रोजेक्ट कुशा: तीन मिसाइलों का त्रिशूल
प्रोजेक्ट कुशा को आधिकारिक तौर पर 'एक्सटेंडेड रेंज एयर डिफेंस सिस्टम' कहा जा रहा है। इसका डिजाइन इस तरह तैयार किया गया है कि दुश्मन चाहे किसी भी ऊंचाई या दूरी से हमला करे, उसे रोकने के लिए भारत के पास पहले से ही कवच मौजूद होगा। इस सिस्टम में तीन मुख्य इंटरसेप्टर मिसाइलें शामिल हैं:
- M1 इंटरसेप्टर: यह मिसाइल 150 किलोमीटर तक की दूरी पर स्थित हवाई लक्ष्यों को निशाना बनाने में सक्षम है। इसका सफल परीक्षण 23 जुलाई को ओडिशा के डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप से किया जा चुका है।
- M2 इंटरसेप्टर: इस मिसाइल की मारक क्षमता को 250 किलोमीटर तक विकसित करने की योजना है।
- M3 इंटरसेप्टर: यह सबसे लंबी दूरी का हथियार होगा, जो 350 से 400 किलोमीटर तक के लक्ष्यों को नष्ट करने में सक्षम होगा।
इन तीनों मिसाइलों के निर्माण में काफी हद तक एक जैसी तकनीकी प्लेटफॉर्म का उपयोग किया जाएगा। इससे न केवल उत्पादन की प्रक्रिया सरल होगी, बल्कि रखरखाव और भविष्य के अपग्रेड में भी काफी आसानी होगी।
लागत में भारी बचत
प्रोजेक्ट कुशा की चर्चा के पीछे एक बड़ा कारण इसकी किफायती लागत भी है। वर्ष 2018 में भारत ने रूस से पांच S-400 स्क्वाड्रन खरीदने के लिए करीब 5.43 अरब डॉलर का करार किया था। वहीं, प्रोजेक्ट कुशा के तहत पांच स्क्वाड्रन के लिए भारतीय वायुसेना को 21,700 करोड़ रुपये की स्वीकृति मिली थी। रक्षा जानकारों का मानना है कि स्वदेशी होने के कारण इस पूरी परियोजना का कुल खर्च S-400 के मुकाबले 50 फीसदी से भी कम रह सकता है। यद्यपि आधिकारिक पुष्टि रखरखाव और रडार प्रणाली के अंतिम स्वरूप के बाद ही संभव होगी, लेकिन यह बचत भारत की रक्षा अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा बदलाव साबित हो सकती है।
सिर्फ मिसाइल नहीं, एक एकीकृत नेटवर्क
प्रोजेक्ट कुशा को सिर्फ एक मिसाइल प्रणाली के तौर पर देखना भूल होगी। इसका लक्ष्य एक ऐसा राष्ट्रीय एयर डिफेंस नेटवर्क बनाना है, जिसमें लंबी दूरी की मिसाइलों के साथ रडार, एडवांस सेंसर और कमांड सेंटर एक साथ काम करेंगे। यह नेटवर्क भविष्य में ड्रोन रोधी हथियारों और लेजर तकनीक को भी अपने साथ जोड़ने में सक्षम होगा। डीआरडीओ का उद्देश्य एक ऐसा 'सुदर्शन चक्र' बनाना है, जो दुश्मन के छोटे ड्रोन से लेकर घातक बैलिस्टिक मिसाइलों तक को आसमान में ही नाकाम कर सके। इसमें पहले से चल रहे बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस यानी BMD कार्यक्रम की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी।
युद्ध की बदलती चुनौतियां और तकनीक का महत्व
आज के दौर में युद्ध केवल बड़े विमानों तक सीमित नहीं हैं। यूक्रेन और पश्चिम एशिया के संघर्षों ने यह साबित किया है कि छोटे और सस्ते ड्रोन भी कितनी बड़ी तबाही मचा सकते हैं। ऐसे में भारत को एक ऐसे एयर डिफेंस नेटवर्क की जरूरत है जो एक साथ अलग-अलग गति और ऊंचाई वाले खतरों को भांप सके। प्रोजेक्ट कुशा इसी कमी को पूरा करता है। जब यह सिस्टम पूरी तरह सक्रिय हो जाएगा, तो यह AI और आधुनिक साइबर सुरक्षा के साथ मिलकर काम करेगा, ताकि दुश्मन के सैचुरेशन अटैक यानी एक साथ कई दिशाओं से होने वाले हमलों को विफल किया जा सके।
भविष्य की राह
भारत ने पहले ही क्विक रिएक्शन SAM और VSHORADS जैसी तकनीकों पर अपना काम शुरू कर दिया है। प्रोजेक्ट कुशा की सफलता यह तय करेगी कि क्या भारत भविष्य में विदेशी एयर डिफेंस सिस्टम की खरीद बंद कर देगा या नहीं। यदि डीआरडीओ अपने AESA रडार और एकीकृत कमांड नेटवर्क को सफलतापूर्वक एक साथ जोड़ने में कामयाब रहता है, तो भारत के पास अपनी जरूरत के मुताबिक विकसित किया गया एक ऐसा सुरक्षा घेरा होगा, जो किसी भी बाहरी निर्भरता के बिना देश की सीमाओं की रक्षा करने में सक्षम होगा। यह न केवल भारतीय वायुसेना की शक्ति में इजाफा करेगा, बल्कि 'मेक इन इंडिया' अभियान के तहत रक्षा क्षेत्र में भारत को आत्मनिर्भर बनाने का एक बड़ा पड़ाव भी होगा।
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