'गृहिणी को होममेकर नहीं, राष्ट्र निर्माता कहें; हर महीने कम से कम ₹30,000 का काम करती है': सुप्रीम कोर्ट भारत एक घंटा पहले 2
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि घर संभालने वाली महिला का योगदान अमूल्य है और मोटर दुर्घटना मुआवजे में घरेलू देखभाल के नुकसान को अतिरिक्त आधार माना जाएगा। 20 साल पुराने मामले में अदालत ने मुआवजा बढ़ाकर 6 लाख रुपये कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक मामले की सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि किसी भी परिवार में पत्नी का योगदान बेहद महत्वपूर्ण होता है। अदालत का मानना था कि इसी कारण उनके लिए "होममेकर" के बजाय "राष्ट्र निर्माता" शब्द का प्रयोग होना चाहिए। न्यायालय ने घरेलू आय के नुकसान को लेकर अहम निर्देश भी जारी किए। बेंच ने स्पष्ट किया कि मोटर दुर्घटना दावों में घरेलू देखभाल के नुकसान को मुआवजा तय करने का एक अतिरिक्त आधार माना जाएगा। इस फैसले से गृहिणियों की मृत्यु पर मुआवजे को नियंत्रित करने वाले पुराने मामलों में पहले से स्थापित सिद्धांतों को और मजबूती मिलेगी।

अदालत ने रेखांकित किया कि घर में काम करने वाली महिला किसी ऐसे व्यक्ति से कमतर नहीं है जो दफ्तर जाकर परिवार चलाने के लिए धन कमाता है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि एक गृहिणी का योगदान बहुत अहम होता है और उसका आर्थिक मूल्यांकन करना कठिन है।

गृहिणियों की आय का आकलन कैसे होगा

पीठ ने स्पष्ट किया कि सड़क दुर्घटनाओं के मामलों में गृहिणी की काल्पनिक आय का आकलन उसके काम, श्रम और त्याग के आधार पर किया जाना चाहिए। अदालत ने अपने आदेश में कहा, "एक गृहिणी की भूमिका उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी परिवार के उस सदस्य की, जिसकी आमदनी स्थिर हो। यदि एक गृहिणी द्वारा किए गए कार्यों का अलग-अलग मूल्यांकन किया जाए, तो इसमें कोई संदेह नहीं कि उसका योगदान उच्च कोटि का और अमूल्य है। वास्तव में, उसके योगदान को केवल मौद्रिक रूप में आंकना कठिन है।"

20 साल पुराने मामले की हो रही थी सुनवाई

वर्ष 2006 में उत्तराखंड में हुए एक सड़क हादसे में एक महिला की मृत्यु हो गई थी। दुर्घटना में शामिल वाहन का बीमा नहीं था, इसलिए वाहन मालिक ने मृतकों के परिजनों को मुआवजा दिया। महिला के पति और नाबालिग बेटे की मौत के बाद मुआवजा 2.50 लाख रुपये तय किया गया। परिवार ने अधिक मुआवजे की मांग को लेकर अपील दायर की, जिसे 2017 में खारिज कर दिया गया। उच्च न्यायालय ने कहा था कि गृहिणी के मामले में मुआवजा जीवन प्रत्याशा और न्यूनतम काल्पनिक आय के आधार पर तय किया जाना चाहिए। न्यायाधिकरण ने महिला की काल्पनिक आय एक दिहाड़ी मजदूर से भी कम आंकी थी और हाई कोर्ट ने भी इसे सही ठहराया।

सुप्रीम कोर्ट ने जताई नाराजगी

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि किसी गृहिणी की आय को दिहाड़ी मजदूर से भी कम कैसे आंका जा सकता है। दो जजों की पीठ ने स्पष्ट किया कि ऐसा आकलन स्वीकार नहीं किया जा सकता। बेंच ने घर के कामकाज में लगने वाले समय और मेहनत को रेखांकित किया तथा मामले में सामने आई कई तथ्यात्मक गलतियों की भी आलोचना की। रिपोर्ट में वाहन का प्रकार गलत दर्ज किया गया था, महिला की उम्र कम बताई गई थी और नाबालिग बेटे को वयस्क दर्शा दिया गया था। पीठ ने मुआवजे की राशि बढ़ाकर 6 लाख रुपये कर दी और मृतक महिला के परिवार को छह सप्ताह के भीतर भुगतान करने का निर्देश दिया।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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