उत्तराखंड
एक घंटा पहले
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नैनीताल की पहचान बने बिगोनिया फूल
पहाड़ों की रानी कहे जाने वाले नैनीताल की प्राकृतिक खूबसूरती में इन दिनों एक खास पौधे ने नई जान फूंक दी है। बिगोनिया के रंग-बिरंगे फूल इस समय शहर के हर घर की बालकनी, आंगन और बगीचों की शोभा बढ़ा रहे हैं। लाल, गुलाबी, सफेद, पीले, नारंगी और बैंगनी जैसे दर्जनों रंगों में खिले ये फूल न केवल पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर रहे हैं, बल्कि स्थानीय लोगों के लिए कमाई का एक बड़ा जरिया भी बनते जा रहे हैं। नैनीताल की ठंडी और नम आबोहवा में ये पौधे इस कदर घुल-मिल गए हैं कि अब इन्हें यहां की पहचान माना जाने लगा है। हालांकि, दिलचस्प तथ्य यह है कि बिगोनिया मूल रूप से यहां का पौधा नहीं है। स्थानीय जानकार बताते हैं कि इसकी शुरुआत अंग्रेजों के शासनकाल के दौरान हुई थी। तब से लेकर आज तक, इन फूलों ने अपनी एक विशेष जगह बना ली है और पीढ़ी दर पीढ़ी इन्हें संजोया जा रहा है।
साढ़े चार दशक का समर्पण
नैनीताल के आयारपाटा क्षेत्र में रहने वाले बच्ची सिंह रावत पिछले लगभग 45 वर्षों से बिगोनिया की खेती कर रहे हैं। उन्होंने 1980 में इस काम को एक छोटे से शौक के रूप में शुरू किया था, जो आज एक सफल व्यवसाय में तब्दील हो चुका है। रावत के पास वर्तमान में बिगोनिया की लगभग 60 से 70 विभिन्न रंगों वाली दुर्लभ किस्में मौजूद हैं। उनका मानना है कि नैनीताल की जलवायु बिगोनिया के विकास के लिए सबसे आदर्श है, इसीलिए यहां खिलने वाले फूलों की गुणवत्ता और रंग अन्य क्षेत्रों की तुलना में कहीं अधिक आकर्षक होते हैं।
मिट्टी तैयार करने की विशेष तकनीक
रावत के अनुसार, बिगोनिया की सफल खेती कोई सरल कार्य नहीं है। इसके लिए पौधे की देखभाल के साथ-साथ मिट्टी तैयार करने की विशेष प्रक्रिया अपनानी पड़ती है। वह बताते हैं कि वे जंगलों से बांज के पेड़ों की पत्तियां इकट्ठा करते हैं और उनसे जैविक खाद तैयार करते हैं। इस खास मिश्रण वाली मिट्टी में ही पौधों का विकास तेजी से होता है और उन पर आने वाले फूल लंबे समय तक खिले रहते हैं। अच्छी गुणवत्ता वाले पौधों को तैयार करने के लिए उन्हें पूरे साल मेहनत करनी पड़ती है, क्योंकि पौधों की सही बढ़त के लिए सटीक तापमान और नमी का संतुलन जरूरी है।
नैनीताल से पूरे उत्तराखंड तक विस्तार
बिगोनिया के फूलों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इनके बीज से जो नया पौधा तैयार होता है, वह अक्सर भिन्न रंग का फूल देता है। यही कारण है कि हर सीजन में लोगों को बिगोनिया के नए और अनूठे रंग देखने को मिलते हैं। फूल खिलने का मुख्य समय मार्च और अप्रैल के महीने होते हैं, जब इनकी मांग सबसे अधिक रहती है। बच्ची सिंह रावत अब इन पौधों को केवल नैनीताल तक सीमित नहीं रख रहे हैं। उनके तैयार किए गए पौधे पिथौरागढ़, अल्मोड़ा, रानीखेत और चमोली समेत पूरे कुमाऊं और गढ़वाल मंडल के जिलों में भेजे जा रहे हैं। इससे उन्हें न केवल स्वरोजगार मिला है, बल्कि क्षेत्र में कई अन्य लोगों को भी रोजगार के नए अवसर प्राप्त हो रहे हैं।
स्वरोजगार की नई राह
बच्ची सिंह रावत का मानना है कि यदि उत्तराखंड सरकार और उद्यान विभाग इस क्षेत्र में अधिक सक्रियता दिखाए, तो बिगोनिया की खेती पहाड़ी किसानों के लिए आय का एक सशक्त माध्यम साबित हो सकती है। सरकार द्वारा अगर किसानों को बेहतर प्रशिक्षण, उच्च गुणवत्ता वाले बीज और मार्केटिंग की सुविधा दी जाए, तो यह छोटे स्तर पर शुरू किया गया काम बड़े स्तर की अर्थव्यवस्था बन सकता है। उनका सपना है कि उत्तराखंड का प्रत्येक पहाड़ी घर कम से कम एक बिगोनिया के पौधे से सुसज्जित हो, जिससे न केवल पर्यावरण की सुंदरता बढ़ेगी, बल्कि लोगों की आर्थिक स्थिति में भी सुधार होगा।
सोशल मीडिया पर छाई फूलों की खूबसूरती
वर्तमान में नैनीताल आने वाले पर्यटक बिगोनिया के बगीचों में तस्वीरें खिंचवाने के लिए खासे उत्साहित रहते हैं। सोशल मीडिया के इस दौर में इन फूलों से सजे घरों और उद्यानों की तस्वीरें इंटरनेट पर खूब वायरल हो रही हैं, जिससे नैनीताल की पर्यटन छवि को भी लाभ मिल रहा है। अंग्रेजों के दौर में सजावट के लिए लाए गए ये फूल अब नैनीताल की सांस्कृतिक विरासत और स्थानीय लोगों की मेहनत का प्रतीक बन चुके हैं। यह कहानी इस बात का प्रमाण है कि लगन और सही तकनीक के साथ प्रकृति के सानिध्य में रहकर कैसे स्वरोजगार का एक बड़ा उदाहरण प्रस्तुत किया जा सकता है।
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