यमुना सफाई पर खर्च हुए 800 करोड़, फिर भी मथुरा-वृंदावन में गंदे नालों का पानी सीधे यमुना में गिर रहा उत्तर प्रदेश एक घंटा पहले 2
धर्मनगरी वृंदावन में करोड़ों रुपये की योजनाओं के बावजूद शहर के गंदे नालों का पानी आज भी सीधे यमुना में गिर रहा है। श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों का कहना है कि सफाई के दावे सिर्फ कागजों तक सीमित रह गए हैं।

वृंदावन वह धाम है, जहां भगवान कृष्ण की भक्ति में लीन होने के लिए दुनिया भर से लोग पहुंचते हैं। हर दिन हजारों श्रद्धालु यहां यमुना स्नान और आचमन करने आते हैं। मगर श्रद्धा की इसी धारा में अब गंदगी का जहर घुलता हुआ दिखाई दे रहा है। कई स्थानों पर शहर के गंदे नाले खुलेआम यमुना में गिरते नजर आते हैं, और यही दृश्य मथुरा-वृंदावन के लोगों का दर्द बनकर सामने आ रहा है।

दावे और हकीकत में बड़ा फासला

भगवान श्रीकृष्ण की पटरानी कही जाने वाली मां यमुना की स्वच्छता को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं और करोड़ों रुपये की योजनाएं बनाई जाती हैं। लेकिन धरातल की सच्चाई यह है कि इसी यमुना में शहर के गंदे नालों का पानी छोड़ा जा रहा है। मथुरा के विधायक और सांसद यह दावा करते हैं कि जिन नालों से पानी छोड़ा जा रहा था, उन्हें बंद कर दिया गया है। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर वे नाले सच में बंद हैं, तो फिर यमुना में लगातार गंदगी कैसे बह रही है।

काले पानी के बीच आस्था की डुबकी

यह वही सच है जो यमुना शुद्धिकरण के तमाम दावों पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है और प्रशासनिक व्यवस्था की पोल भी खोलता है। काले पानी के साथ बहती गंदगी और उसी के बीच आस्था के साथ खड़ी जनता—यह तस्वीर परेशान करने वाली है। बड़ा सवाल यह है कि जब यमुना सफाई के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च हो चुके हैं, तो ये नाले अब तक बंद क्यों नहीं हुए। क्या योजनाएं केवल फाइलों तक सीमित रह गई हैं, या जिम्मेदार विभागों की अनदेखी ने यमुना को इस हालत में पहुंचा दिया है।

श्रद्धालुओं ने सुनाई खरी-खरी

वृंदावन दर्शन करने आए श्रद्धालुओं ने यमुना में गिरती गंदगी पर खुलकर नाराजगी जताई। उनका कहना था कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि यमुना में गंदे नाले गिर रहे हैं।

धर्मेंद्र और देवी चंद शर्मा नाम के श्रद्धालुओं ने बताया कि जिस तरह यमुना में नाले गिर रहे हैं, उसकी जानकारी यहां के जनप्रतिनिधियों को होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यमुना का जल इतना जहरीला हो गया है कि अब यहां आने का मन नहीं करता।

दर्शन करने आए उदिता शर्मा और वेद प्रकाश का कहना था कि सरकार यमुना शुद्धिकरण के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च करती है, लेकिन धरातल पर उसका कोई असर नहीं दिखता। उनके मुताबिक यमुना सिर्फ कागजों में ही साफ हो रही है।

800 करोड़ खर्च, फिर भी हालत जस की तस

लोगों का सवाल है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद जमीन पर बदलाव क्यों नहीं दिखता। सरकारें बदलती रहीं, योजनाएं बनती रहीं और हर बार यमुना को स्वच्छ बनाने का दावा किया गया, मगर जमीनी तस्वीर कुछ और ही कहानी कहती है। मथुरा-वृंदावन में यमुना को प्रदूषण मुक्त करने के लिए अब तक 800 करोड़ रुपये की धनराशि खर्च हो चुकी है। इसके बावजूद शहर के तमाम नालों का पानी सीधे यमुना में गिर रहा है। पानी को साफ करने के लिए करोड़ों रुपये की लागत से बने एसटीपी प्लांट खराब पड़े हैं। हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि पर्यटकों के साथ-साथ स्थानीय श्रद्धालु भी यमुना आचमन करने से हिचकने लगे हैं। ब्रजवासियों ने स्थानीय स्तर पर यमुना शुद्धिकरण के लिए कई बार आंदोलन भी चलाए, लेकिन सभी आंदोलन सिर्फ आश्वासन बनकर रह गए।

क्या पैसा सिर्फ कागजों में बह रहा है

यमुना की स्वच्छता के लिए हर साल मथुरा-वृंदावन को अरबों रुपये की धनराशि मिलती है। मगर सवाल यह है कि यह पैसा आखिर जाता कहां है। यमुना की गंदगी धरातल पर तो साफ नहीं दिखती, लेकिन कागजों में यमुना में दूध जैसा साफ पानी बहता दिखाया जाता है। ऐसा लगता है मानो करोड़ों रुपये सिर्फ कागजों में ही बह रहे हों। यह भी पूछा जा रहा है कि क्या जिम्मेदार विभाग एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालकर बच निकलते हैं।

सबसे बड़ा सवाल

जिस यमुना को लोग मां का दर्जा देते हैं, उसी में गंदगी बहते देखना श्रद्धालुओं को परेशान कर रहा है। आशंका जताई जा रही है कि अगर यही हाल रहा तो आने वाली पीढ़ियां शायद वह स्वच्छ यमुना कभी देख ही नहीं पाएंगी, जिसका वर्णन धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। वृंदावन में यमुना की ये तस्वीरें कई बड़े सवाल छोड़ती हैं कि करोड़ों की योजनाओं का लाभ जमीन पर क्यों नहीं दिखता, गंदे नाले आज भी यमुना में क्यों गिर रहे हैं, और जनता कब तक आस्था के नाम पर सिर्फ वादे सुनती रहेगी। सबसे बड़ा प्रश्न यह भी है कि क्या मथुरा के विधायक, सांसद और अधिकारी इसी यमुना के जल का आचमन करने के लिए तैयार हैं।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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