ग्राउंड रिपोर्ट: जिस गोकुल में श्रीकृष्ण ने रची थीं बाल लीलाएं, वही पूतना कुंड आज उपेक्षा का शिकार उत्तर प्रदेश 2 घंटे पहले 6
मथुरा के गोकुल स्थित पूतना कुंड, जहां माना जाता है कि बालक कृष्ण ने राक्षसी पूतना का वध किया था, आज गंदे पानी और झाड़ियों के बीच बदहाल पड़ा है। वर्ष 2014-15 में लगभग 50 लाख रुपये से हुए कायाकल्प के बावजूद यह ऐतिहासिक स्थल फिर जर्जर हो चुका है।

मथुरा के कंस कारागार में जन्म लेने वाले भगवान श्रीकृष्ण को वासुदेव जी जन्म के तुरंत बाद टोकरी में रखकर यमुना पार गोकुल ले गए थे और नंद बाबा के घर छोड़ आए थे। इसी गोकुल की धरती से जुड़ी एक धरोहर आज प्रशासनिक अनदेखी की कहानी बयां कर रही है। द्वापर काल का यह स्थल आज भी मौजूद है और पूतना कुंड के नाम से जाना जाता है, लेकिन इसकी मौजूदा हालत श्रद्धालुओं को निराश कर रही है।

पौराणिक मान्यता और कृष्ण की लीला

मान्यता के अनुसार कृष्ण की छठी के दिन कंस ने अपनी सबसे बलशाली राक्षसी पूतना को उन्हें मारने के लिए भेजा था। पूतना ने सुंदर स्त्री का रूप धारण किया और अपने स्तनों में विष लगाकर कृष्ण को दूध पिलाकर मारने की योजना बनाई। लेकिन भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी लीला से उसी का वध कर दिया।

कहा जाता है कि महज छह दिन की शिशु अवस्था में ही कृष्ण ने पूतना का वध कर ब्रज में राक्षसों से मुक्ति की शुरुआत कर दी थी। इसके जरिये उन्होंने ब्रजवासियों को यह संदेश दिया कि वे कोई साधारण बालक नहीं हैं और जल्द ही मथुरा तथा ब्रजधाम कंस के अत्याचारों से मुक्त होने वाले हैं। इसके बाद कंस द्वारा भेजे गए अघासुर और बकासुर जैसे अनेक राक्षसों का भी उन्होंने वध कर उन्हें मोक्ष प्रदान किया।

कहां है पूतना कुंड

गोकुल की ओर लगभग 30-40 कदम चलते ही लाल पत्थर से बना एक स्थल नजर आता है, जिसे पूतना कुंड कहा जाता है। माना जाता है कि यहीं पर करीब 5,200 वर्ष पहले राक्षसी पूतना ने छठी के दिन भगवान कृष्ण को दूध की जगह विष पिलाने का प्रयास किया था।

50 लाख की लागत से हुआ था कायाकल्प

वर्ष 2014-15 में लगभग 50 लाख रुपये की लागत से इस कुंड का कायाकल्प कराया गया था, लेकिन करीब साढ़े तीन साल में ही यह दोबारा जर्जर स्थिति में पहुंच गया। सड़क किनारे लगा पर्यटन विभाग का साइन बोर्ड अब सफेद रंग से रंगा हुआ है, हालांकि उस पर पूतना कुंड का उल्लेख अब भी पढ़ा जा सकता है।

कुंड के चारों ओर लाल पत्थर की बेंचें बनी हुई हैं, टहलने के लिए फुटपाथ और विश्राम के लिए पत्थर की बारादरी भी बनाई गई है। कभी यह कुंड विशाल क्षेत्र में फैला हुआ था, लेकिन सौंदर्यीकरण के बाद यह सिमटकर लगभग दो-ढाई सौ वर्गगज तक रह गया है।

उपेक्षा में डूबा ऐतिहासिक स्थल

सौंदर्यीकरण के बाद पर्यटन विभाग ने इसकी देखरेख पर ध्यान नहीं दिया। यहां भरा हुआ पानी दूषित प्रतीत होता है और किनारों पर विलायती बबूल उगने लगे हैं। इस हालत को देखकर श्रद्धालु पर्यटन विभाग और नगर पंचायत प्रशासन की लापरवाही पर सहज ही सवाल उठा रहे हैं।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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