राष्ट्रीय राजनीति
एक घंटा पहले
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मैरिटल रेप का कानूनी भविष्य
भारत में वैवाहिक बलात्कार यानी मैरिटल रेप का मुद्दा एक बार फिर देश की सबसे बड़ी अदालत की चौखट पर है। सुप्रीम कोर्ट में इस विषय पर गहन विचार-विमर्श शुरू होने वाला है कि क्या एक पति अपनी पत्नी के साथ उसकी इच्छा के विरुद्ध जबरन यौन संबंध बनाता है, तो क्या इसे कानून की नजर में बलात्कार माना जा सकता है। क्या पत्नी की मर्जी के बिना सेक्स करना किसी व्यक्ति पर बलात्कार का मुकदमा चलाने का आधार हो सकता है? इन महत्वपूर्ण सवालों का जवाब तलाशने के लिए चीफ जस्टिस सूर्यकांत के नेतृत्व में एक बेंच का गठन किया गया है, जिसने इस मामले से जुड़ी सभी याचिकाओं को अंतिम सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कर दिया है।
कानून की संवैधानिक वैधता पर बहस
इस सुनवाई का दायरा केवल वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने तक सीमित नहीं है। अदालत के सामने एक बेहद पेचीदा और महत्वपूर्ण कानूनी पहेली भी रखी गई है। मुख्य सवाल यह है कि जब तक सुप्रीम कोर्ट वैवाहिक बलात्कार के वर्तमान अपवाद की संवैधानिक वैधता पर अपना अंतिम फैसला नहीं सुना देता, तब तक क्या किसी पति के खिलाफ बलात्कार का केस दर्ज किया जा सकता है या नहीं? इस कानूनी जटिलता ने मामले की गंभीरता को और बढ़ा दिया है।
सेक्शन 377 और 376 का संदर्भ
अदालत इस पूरे मामले में कानून की धाराओं का भी विश्लेषण करेगी। सुनवाई के दौरान यह भी चर्चा का विषय होगा कि भारतीय दंड संहिता की धाराओं, विशेषकर सेक्शन 376 और सेक्शन 377 के प्रावधान इस संदर्भ में किस प्रकार लागू होते हैं। कोर्ट यह तय करेगा कि क्या वैवाहिक रिश्ते की आड़ में मौजूद अपवाद को बरकरार रखा जाना चाहिए या फिर इसे हटाकर महिला की सहमति को प्राथमिकता देनी चाहिए। इस फैसले का असर देश के वैवाहिक कानूनों और महिलाओं के अधिकारों पर बहुत गहरा और दूरगामी होगा।
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