मध्य प्रदेश में फर्जी एमबीबीएस डिग्री से सरकारी नौकरी का बड़ा रैकेट बेनकाब, तीन नकली डॉक्टर पकड़े गए मध्य प्रदेश 53 मिनट पहले 2
मध्य प्रदेश में जाली एमबीबीएस डिग्री और नकली रजिस्ट्रेशन के सहारे सरकारी अस्पतालों में नौकरी कर रहे गिरोह का खुलासा हुआ है। पुलिस ने अब तक तीन फर्जी डॉक्टरों को गिरफ्तार किया है।

भोपाल: मध्य प्रदेश में एक ऐसे संगठित गिरोह का भंडाफोड़ हुआ है, जो फर्जी एमबीबीएस डिग्री के दम पर सरकारी नौकरियां हासिल करवा रहा था। इस पूरे मामले में पुलिस अब तक 3 फर्जी डॉक्टरों को गिरफ्तार कर चुकी है। यह फर्जीवाड़ा नेशनल हेल्थ मिशन के संजीवनी क्लीनिकों में लंबे समय से चल रहा था। गिरोह डॉक्टर की नकली डिग्री तैयार करवाने के साथ ही मेडिकल काउंसिल का फर्जी रजिस्ट्रेशन नंबर भी बनवा देता था।

पुलिस के शिकंजे में आए ये नकली डॉक्टर जाली एमबीबीएस डिग्री के सहारे सरकारी अस्पतालों में सेवाएं दे रहे थे। आरोपियों ने न सिर्फ फर्जी डिग्री हासिल की थी, बल्कि गलत तरीके से अपना रजिस्ट्रेशन भी करवा रखा था और बरसों से मरीजों की सेहत के साथ खिलवाड़ करते रहे। स्वास्थ्य विभाग की शिकायत के आधार पर पुलिस ने दमोह से दो फर्जी डॉक्टरों को दबोचा।

मामले की परतें तब खुलनी शुरू हुईं, जब दमोह के सीएचएमओ के पास शिकायतें पहुंचीं कि नेशनल हेल्थ मिशन के अंतर्गत चल रहे संजीवनी क्लीनिकों में कुछ डॉक्टर जाली डिग्री के बल पर नौकरी कर रहे हैं। शुरुआती पड़ताल में जब ये शिकायतें सही निकलीं, तो मामला पुलिस तक पहुंचा और एक के बाद एक पूरे रैकेट का जाल सामने आने लगा।

आरोपियों की पहचान

पकड़े गए आरोपियों की पहचान डॉ. सचिन यादव, डॉ. राजपाल गौर और अजय मौर्य के रूप में हुई है। इनमें सचिन यादव और राजपाल गौर दमोह के सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में पदस्थ थे। इनकी गिरफ्तारी के बाद जैसे-जैसे कड़ियां आपस में जुड़ीं, तीसरे आरोपी अजय मौर्य को जबलपुर से गिरफ्तार किया गया।

जांच के दौरान सबसे पहले ग्वालियर के रहने वाले सचिन यादव और सीहोर निवासी राजपाल गौर को पकड़ा गया। पड़ताल में इन दोनों की एमबीबीएस डिग्रियां पूरी तरह नकली साबित हुईं। दरअसल सचिन यादव के पास बीडीएस की डिग्री है, जबकि राजपाल गौर बीएचएमएस की डिग्री रखते हैं। वहीं जबलपुर निवासी अजय मौर्य महज बीएससी पास है।

5 लाख रुपये में बनवाई नकली डिग्रियां

पूछताछ में आरोपियों ने कबूल किया कि उन्होंने 5 लाख रुपये खर्च करके नकली डिग्रियां तैयार करवाई थीं और उन्हीं के बूते सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में नौकरी पाई थी। लेकिन इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इन नकली डॉक्टरों को सरकारी अस्पतालों तक पहुंचाने वाला कौन था।

फर्जी डॉक्टर तैयार करने और उन्हें सरकारी तंत्र में फिट कराने का यह पूरा खेल भोपाल स्थित नेशनल हेल्थ मिशन के दफ्तर से संचालित हो रहा था। गिरफ्त में आए डॉक्टरों ने स्वीकार किया है कि इस साजिश के मास्टरमाइंड मुकेश चौधरी और हीरा सिंह थे, जो जाली डिग्रियां बनाते थे, जबकि एनएचएम के भीतर इन्हें नौकरी दिलाने का काम वहां का आईटी लैब टेक्नीशियन आदिल संभालता था।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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