नौतपा की तपिश में जूझते कर्मवीर: पाली में 55 डिग्री की भट्ठियों के आगे डटे कारीगर, मजदूर और किसान राजस्थान एक घंटा पहले 2
नौतपा के आखिरी दौर में पाली भीषण गर्मी से तप रहा है। 55 डिग्री तक गर्म भट्ठियों के सामने हलवा बनाते कारीगर, पसीने में भीगकर दुपट्टे बुनते मजदूर और झुलसती धूप में फसल समेटते किसान अपनी जिम्मेदारियों के लिए लगातार जुटे हुए हैं।

नौतपा अपने आखिरी दौर में है और मारवाड़ का पारा एक बार फिर आसमान छूने लगा है। भले ही कुछ इलाकों को अंधड़ और हल्की फुहारों से थोड़ी राहत मिली हो, लेकिन आसमान से बरसती आग ने जनजीवन को बेहाल कर रखा है। जहां लोग एसी और कूलर के सामने से हटने को तैयार नहीं हैं, वहीं पाली की सड़कों, फैक्ट्रियों और खेतों से ऐसी तस्वीरें सामने आई हैं जो दिल को छू लेती हैं। दूसरों का तन ढकने के लिए सूती दुपट्टे बुनते पसीने से तर मजदूर, विदेशों तक मिठास पहुंचाने के लिए 55 डिग्री की भट्ठी के आगे जूझते कारीगर और झुलसा देने वाली धूप में फसल समेटते किसान—इन कर्मवीरों के हौसले गर्मी के आगे झुकने को तैयार नहीं हैं। हालत यह है कि मोबाइल फोन तक गर्मी से ओवरहीट होकर बंद हो रहे हैं।

55 डिग्री की भट्ठी के सामने पकता पाली का मशहूर हलवा

विदेशों तक अपनी मिठास बिखेरने वाले पाली के प्रसिद्ध हलवे को तैयार करने वाले कारीगरों की मेहनत किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। कोयले की जलती भट्ठियों के सामने लगातार खड़े रहकर दूध पकाने और कड़ाही में भारी खुरपा चलाने के कारण भट्ठी के आसपास का तापमान 55 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। इस कारखाने में काम करने वाले कारीगर सुमेर बताते हैं कि भट्ठी के पास इतनी भयंकर गर्मी रहती है कि उनकी जेब में रखे मोबाइल फोन तक ओवरहीट होकर बंद हो जाते हैं। ऐसे में मजबूरन फोन को किसी दूसरे ठंडे कमरे में रखना पड़ता है।

भीषण धूप में भी कम नहीं हुई हलवे की मांग

हैरानी की बात यह है कि इस झुलसा देने वाले मौसम में भी पाली के इस लजीज हलवे की मांग में कोई कमी नहीं आई है। हलवा विक्रेता चैनसिंह के अनुसार, भीषण गर्मी के इस दौर में भी उनकी दुकान पर पहुंचने वाले ग्राहकों की संख्या पहले जैसी ही बनी हुई है। लोग चाव से हलवा खरीद रहे हैं, जिसके चलते कारीगरों को बिना रुके इस आग के सामने लगातार काम करना पड़ रहा है।

दूसरों को ठंडक देने के लिए तपते टेक्सटाइल मजदूर

गर्मी के इस मौसम में धूप से बचने के लिए बाजारों में सूती दुपट्टों की मांग अचानक बहुत बढ़ जाती है। पाली की टेक्सटाइल इंडस्ट्री से इन दुपट्टों की आपूर्ति देशभर में की जाती है। फैक्ट्री संचालक ललित मालू कहते हैं कि दूसरों को भीषण गर्मी में राहत मिल सके, इसके लिए उनके मजदूर दिन-रात पसीने में भीगकर दुपट्टे तैयार कर रहे हैं। मंडिया रोड स्थित फैक्ट्री में काम करने वाले मजदूर सुमेरसिंह ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा कि इतनी तेज गर्मी और उमस में काम करना बेहद मुश्किल है, लेकिन परिवार के पालन-पोषण और पेट की भूख के आगे इस गर्मी को सहना उनकी मजबूरी है।

काम करेंगे, तभी चलेगा घर

अंबेडकर सर्किल क्षेत्र में तीखी दोपहरी और भीषण धूप के बीच कुछ मजदूर सड़क किनारे सीमेंट के भारी-भरकम ब्लॉक लगाने में जुटे दिखे। पिछले 15-20 सालों से यही काम कर रहे मजदूर बाबू खान ने बताया कि इस जानलेवा गर्मी से बचने के लिए वे सिर पर गीला कपड़ा बांधते हैं और थोड़ी-थोड़ी देर में पानी पीते रहते हैं। उनका कहना है कि रोजी-रोटी के लिए मौसम की परवाह नहीं की जा सकती। तीखी दोपहरी में भी काम करना ही पड़ेगा, क्योंकि वे काम करेंगे तभी शाम को उनका घर चल पाएगा। अगर वे काम नहीं करेंगे, तो दूसरों तक अन्न कैसे पहुंचेगा।

लू और धूप में भी खेतों में जुटा अन्नदाता

इन सबसे अलग, पाली के हाईवे क्षेत्र के ग्रामीण अंचलों से देश के अन्नदाता का सबसे गौरवमयी रूप सामने आया। भयंकर लू और तेज धूप के बीच एक किसान परिवार मवेशियों के चारे और फसलों की कटाई में जुटा नजर आया। खेत में काम कर रही महिलाओं ने कहा कि किसान के लिए सर्दी या गर्मी का कोई खास महत्व नहीं होता, क्योंकि खेती का काम समय पर निपटाना जरूरी है। अगर समय पर फसल नहीं काटी गई, तो वह खराब हो जाएगी। उन्होंने बताया कि जब गर्मी बर्दाश्त से बाहर हो जाती है, तो वे कुछ देर पेड़ की छांव में बैठ जाते हैं, ठंडी छाछ या पानी पीकर शरीर को राहत देते हैं और फिर काम में जुट जाते हैं।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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