मधुबनी में आज भी तामा से नापते हैं चावल, एक सेर में भर जाता है पांच लोगों का पेट, लक्ष्मी रूप में होती है पूजा बिहार 2 घंटे पहले 14
मिथिलांचल के गांवों में आज भी चावल, दाल और आटा तराजू की जगह तामा से नापा जाता है। एक सेर चावल में आराम से पांच लोग भोजन कर लेते हैं और लोग इस तामा को लक्ष्मी का रूप मानकर पूजते भी हैं।

आज के दौर में किसी भी सामान को तौलने के लिए तराजू का सहारा लिया जाता है और एक किलो को 1000 ग्राम माना जाता है। लेकिन मिथिलांचल में एक समय ऐसा भी था जब चावल, दाल और आटा जैसी चीजें तराजू से नहीं, बल्कि तामा से नापी जाती थीं। बिहार के अलग-अलग इलाकों में इसी बर्तन को तामा, सेराही या पेला (पायला) के नाम से जाना जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह परंपरा आज भी जीवित है।

किलो नहीं, सेर के हिसाब से होती है माप

खाना बनाते समय अक्सर यह उलझन रहती है कि चार या पांच लोगों के लिए कितना चावल चढ़ाया जाए। आजकल ज्यादातर लोग ग्लास या किसी बर्तन से चावल नाप लेते हैं, लेकिन गांवों में अब भी पुराने ढंग से तामा का इस्तेमाल होता है। यहां किलो के बजाय सेर और डेढ़ सेर के हिसाब से चावल मापा जाता है। अगर चार या पांच लोगों को भोजन कराना हो तो एक सेर चावल तामा (सेराही) से नापकर पकाया जाता है, और इतने में पांच लोग आराम से पेट भर लेते हैं।

बुजुर्ग महिला की जुबानी पुरानी परंपरा

इस परंपरा को लेकर बुजुर्ग महिला बीना देवी बताती हैं कि शादी के बाद जब वह ससुराल आईं तो उनकी सास कहती थीं कि तीन सेर चावल चढ़ा दो, पूरा परिवार खा लेगा। सेर मापने के लिए तामा (सेराही) ही काम आता था और एक सेर चावल से पांच लोगों का पेट भर जाता था।

उनके मुताबिक पीतल का तामा करीब 750-800 ग्राम के बराबर माना जाता है, जबकि लकड़ी से बना तामा लगभग 600 ग्राम का होता है। यहां के लोग इस तामा को लक्ष्मी का रूप मानते हैं और दिवाली समेत दूसरे शुभ अवसरों पर इसकी पूजा भी करते हैं।

इस तरह अनाज बचाकर रखती थीं गृहणियां

बीना देवी आगे बताती हैं कि उनकी सास उन्हें सिखाती थीं कि रोजाना खाना बनाने वाली हर गृहिणी को चूल्हे पर चावल चढ़ाते समय तामा से एक-दो मुट्ठी चावल अलग निकालकर बचाकर रखना चाहिए। इस तरह 30 दिन में तीन से चार सेर चावल जमा हो जाते थे।

यह दरअसल अनाज को संभालकर रखने यानी घर के प्रबंधन का एक तरीका था, ताकि विपत्ति या तंगी के समय जब घर में अनाज कम पड़ जाए, तो उसी बचाए हुए चावल को निकालकर पकाया जा सके।

बदल गया जमाना, पर जिंदा है याद

बीना देवी कहती हैं कि उन्होंने तो ऐसा ही जीवन जिया है। हालांकि अब वह दौर नहीं रहा, फिर भी वह अपने से छोटों को ये बातें जरूर बताती हैं। आज भले ही लोग ग्लास से चावल नापते हों, लेकिन कभी माप का सबसे बड़ा सहारा तामा ही हुआ करता था।

चेतन शुक्ला
Official Verified Account

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

आपकी प्रतिक्रिया?


आपको यह भी पसंद आ सकता हैं

Comments

https://pabna.in/assets/images/user-avatar-s.jpg

0 comment

Write the first comment for this!