गोट गुरुकुल मॉडल: जब किसान बने शिक्षक, बकरी पालन से बढ़ी ग्रामीण आय उत्तर प्रदेश एक घंटा पहले 2
इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ गोट मैनेजमेंट (IIGM) के गोट गुरुकुल परिसर को देश का पहला सामुदायिक प्रशिक्षण एवं अधिगम केंद्र घोषित किया गया है, जहां प्रशिक्षित किसान ही अपने समुदाय को बकरी पालन की तकनीक सिखा रहे हैं और अतिरिक्त मुनाफा कमा रहे हैं।

लघु पशुपालन को ग्रामीण आजीविका का मजबूत सहारा बनाने की कोशिश में लखनऊ का गोट गुरुकुल परिसर एक नए सामुदायिक अधिगम मॉडल के तौर पर सामने आया है। इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ गोट मैनेजमेंट (IIGM) और द गोट ट्रस्ट ने लखनऊ के टीजीटी नगर स्थित इस परिसर को छोटे पशुपालन यानी बकरी पालन के लिए देश का पहला सामुदायिक अधिगम एवं प्रशिक्षण केंद्र घोषित किया है।

यहां की खास बात यह है कि किसानों को ही प्रशिक्षक बनाकर “किसान से किसान” सीखने-सिखाने की व्यवस्था को आगे बढ़ाया जा रहा है। संस्थान का मानना है कि बकरी, भेड़ और बैकयार्ड पोल्ट्री जैसी गतिविधियां ग्रामीण महिलाओं और सीमांत किसानों की आमदनी का अहम जरिया हैं, लेकिन अधिकांश सरकारी प्रशिक्षण जिला मुख्यालयों तक ही सिमटे रहने के कारण तकनीकी जानकारी गांव के पशुपालकों तक ठीक से नहीं पहुंच पाती।

गांव के नजदीक मिल रहा व्यावहारिक प्रशिक्षण

इसी कमी को दूर करने के लिए गोट गुरुकुल मॉडल तैयार किया गया है। इसमें गांवों के आसपास ही प्रशिक्षण आयोजित कर किसानों को काम के दौरान सीखने योग्य व्यावहारिक जानकारी दी जाती है, ताकि तकनीक उन तक प्रभावी ढंग से पहुंच सके।

“मेजर फैसिलिटेटर” के रूप में तैयार हो रहे किसान

संस्थान ने प्रगतिशील किसानों को “मेजर फैसिलिटेटर” के रूप में प्रशिक्षित किया है। इन किसानों को वयस्क शिक्षा, रिकॉर्ड प्रबंधन, सहजीकरण, एफपीसी संचालन और वैल्यू चेन आधारित पशुपालन का प्रशिक्षण दिया गया है। अब यही प्रशिक्षित किसान अपने समुदाय में चारा प्रबंधन, रोग नियंत्रण, प्रजनन तकनीक और बाजार से जुड़ाव जैसे विषयों पर दूसरों को सिखा रहे हैं।

बिहार में सफल रहा प्रयोग

इस मॉडल की कामयाबी बिहार के मधेपुरा और पूर्णिया जिलों में हुए हीट सिंक्रोनाइजेशन और कृत्रिम गर्भाधान के प्रयोग में दिखाई दी। 100 से अधिक गैर-गर्भवती बकरियों पर किए गए इस प्रयोग में 12 प्रशिक्षित महिला किसान फैसिलिटेटर्स ने गांव स्तर पर तकनीक का संचालन किया। नतीजा यह रहा कि 80 प्रतिशत से अधिक गर्भधारण दर दर्ज हुई, जो पारंपरिक तरीके के मुकाबले काफी बेहतर है।

किसानों को कितना फायदा

इस प्रयोग में जमुनापारी क्रॉस नस्ल के बच्चों का औसत वजन आठ माह में 16 से 18 किलोग्राम तक पहुंच गया, जबकि स्थानीय नस्लों में यह 9 से 10 किलोग्राम ही रहा। संस्थान के अनुसार, किसानों को प्रति बकरी करीब 350 रुपये के निवेश पर छह माह में 3,500 रुपये तक का अतिरिक्त लाभ मिला। यही वजह है कि अब कई किसान अग्रिम शुल्क देकर AI (कृत्रिम गर्भाधान) सेवाएं ले रहे हैं।

“अपनी भाषा में समझी गई तकनीक ज्यादा असरदार”

IIGM के संस्थापक प्रो. संजीव कुमार ने कहा कि तकनीक तभी अधिक प्रभावी होती है, जब किसान उसे अपनी भाषा और अपने परिवेश में समझते हैं। उन्होंने कहा कि गोट गुरुकुल ने यह साबित कर दिया है कि जब किसान खुद शिक्षक की भूमिका निभाता है, तो विकास की प्रक्रिया अधिक तेज और टिकाऊ बन जाती है।

100 केंद्र खोलने का लक्ष्य

संस्थान ने बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के दूरस्थ इलाकों में ऐसे 100 सामुदायिक प्रशिक्षण केंद्र स्थापित करने का लक्ष्य रखा है। ये केंद्र प्रशिक्षण के साथ-साथ डेमो फार्म, पशुमार्ट और वित्तीय समावेशन केंद्र के रूप में भी काम करेंगे।

चेतन शुक्ला
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चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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