सितंबर में धान की रोपाई करने वाले किसान हो जाएं सावधान, ठंड से फसल बचाने के लिए कृषि विशेषज्ञों की सलाह झारखंड 4 घंटे पहले 2
पलामू में मानसून की देरी के कारण किसान सितंबर में धान की रोपाई कर रहे हैं, लेकिन कृषि वैज्ञानिकों ने बढ़ती ठंड से फसल को होने वाले संभावित नुकसान को लेकर सचेत किया है।

पलामू में धान की खेती और मानसून का असर

पलामू जैसे क्षेत्रों में खेती पूरी तरह से मानसून की बारिश पर टिकी रहती है। यह इलाका रेन शैडो जोन के अंतर्गत आता है, जिसकी वजह से यहां आमतौर पर बारिश की कमी बनी रहती है। खरीफ के मौसम में किसानों को अक्सर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, फिर भी धान यहां की सबसे प्रमुख और पारंपरिक फसल है। किसान पहले धान का बिचड़ा तैयार करते हैं और फिर बारिश का इंतजार करते हैं ताकि खेतों में रोपाई का कार्य शुरू किया जा सके।

देरी से रोपाई पर कृषि विशेषज्ञों की राय

पलामू जिले के कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रमोद कुमार ने बताया कि इस साल मानसून के शुरुआती महीनों में बारिश कम हुई, जिससे किसानों को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। हालांकि, अगस्त के दौरान हुई अच्छी और कुछ स्थानों पर औसत से अधिक बारिश ने किसानों में एक नई उम्मीद जगाई है। खेतों में पर्याप्त पानी उपलब्ध होने के कारण अब बहुत से किसान सितंबर के महीने में भी धान की रोपाई कर रहे हैं। किसानों को यह उम्मीद है कि भले ही रोपाई में देरी हुई है, लेकिन फसल अंततः तैयार हो जाएगी।

बढ़ती ठंड और फसल पर मंडराता खतरा

कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रमोद कुमार ने उन किसानों को विशेष रूप से सावधान रहने की सलाह दी है, जो सितंबर में धान लगा रहे हैं। उन्होंने समझाया कि धान की रोपाई यदि सही समय पर होती है, तो फसल को पकने के लिए पर्याप्त समय मिलता है। लेकिन सितंबर में रोपाई करने से फसल की समय अवधि काफी आगे बढ़ जाती है, जिससे धान की फसल नवंबर और दिसंबर महीने तक खेतों में खड़ी रह सकती है।

इस दौरान मौसम में धीरे-धीरे ठंड बढ़नी शुरू हो जाती है, जिसका प्रतिकूल प्रभाव धान की फसल पर पड़ता है। कम तापमान का सीधा असर पौधों की बढ़वार, उनमें कल्ले फूटने और दाना भरने की प्रक्रिया पर पड़ता है। ठंड बढ़ने से धान के पौधों में फुटाव और दाने बनने की क्षमता कमजोर हो सकती है, जिसका अंतिम परिणाम उत्पादन में भारी कमी के रूप में सामने आ सकता है। यही कारण है कि देरी से रोपाई करने वाले किसानों को फसल प्रबंधन की प्रक्रियाओं पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है।

फसल सुरक्षा और पोषण प्रबंधन के उपाय

डॉ. कुमार के अनुसार, देरी से लगाई गई फसल को पर्याप्त पोषण प्रदान करना सफलता के लिए सबसे महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने किसानों को सलाह दी कि वे मिट्टी की उर्वरता और फसल की आवश्यकताओं को समझते हुए ही संतुलित मात्रा में खाद का प्रयोग करें। विशेष रूप से पोटाश का उपयोग करना पौधों को मजबूती प्रदान करता है और खराब मौसम की स्थितियों में भी फसल की सहनशीलता को बढ़ाने में मदद करता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उर्वरकों की मात्रा को बिना किसी ठोस आधार के बढ़ाने के बजाय, मिट्टी की जांच करवाना और स्थानीय कृषि विशेषज्ञों से परामर्श लेना सबसे उत्तम और सुरक्षित तरीका है।

पशु चारे की आवश्यकता और नियमित निगरानी

किसान इस बात को लेकर भी उत्साहित हैं कि देरी के बावजूद धान की खेती से उन्हें अनाज के साथ-साथ पशुओं के लिए पर्याप्त चारा भी प्राप्त हो जाएगा। किसानों के लिए धान की फसल केवल अनाज का जरिया नहीं है, बल्कि यह पशुपालन के लिए भी अनिवार्य है। भले ही समय पर लगाई गई फसल की तुलना में देर से लगाई गई धान का उत्पादन थोड़ा कम हो सकता है, लेकिन किसान इसे एक अतिरिक्त लाभ के रूप में देखते हैं।

अंत में, कृषि वैज्ञानिकों ने सुझाव दिया है कि सितंबर में धान लगा रहे किसानों को इन बातों का पालन करना चाहिए:

  • खेत में पानी की उपलब्धता को हमेशा आवश्यकता के अनुसार बनाए रखें।
  • फसल की नियमित निगरानी करें ताकि किसी भी कीट या बीमारी की पहचान जल्दी हो सके।
  • मिट्टी के पोषण स्तर को सही बनाए रखें और पोषक तत्वों की कमी न होने दें।
  • बढ़ती ठंड से पहले फसल को पोषण और खाद देकर सुरक्षित करें।

समय रहते खेत का सही प्रबंधन करने से उत्पादन को नुकसान से बचाया जा सकता है और फसल की पैदावार को बेहतर रखा जा सकता है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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