प्लास्टिक और स्टील को पीछे छोड़ मिट्टी की बोतलें फिर बनीं पसंद, गर्मी में बढ़ी मांग से कुम्हारों की कमाई में उछाल उत्तर प्रदेश एक घंटा पहले 2
उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में कुम्हार आधुनिक इलेक्ट्रिक चाक की मदद से मिट्टी की आकर्षक बोतलें बना रहे हैं, जिनकी बढ़ती मांग से उन्हें रोजाना हजारों रुपये की कमाई हो रही है। बाजार में ये बोतलें 150 से 200 रुपये तक बिक रही हैं।

आज जब चारों ओर प्लास्टिक और स्टील की बोतलों का बोलबाला है, तब उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में मिट्टी की बोतलें एक बार फिर लोगों की पसंद बनकर उभर रही हैं। खीरी जिले के कुम्हार परिवार अपनी पारंपरिक कला को आधुनिक तकनीक से जोड़कर इन बोतलों को नया रूप दे रहे हैं। पानी को कुदरती तरीके से ठंडा रखने वाली ये बोतलें पर्यावरण और सेहत दोनों के लिहाज से बेहतर मानी जा रही हैं, और बढ़ती मांग ने कारीगरों के लिए कमाई का नया रास्ता खोल दिया है।

सेहत और पर्यावरण के प्रति जागरूकता ने बढ़ाई पसंद

बदलते समय के साथ लोगों में पर्यावरण को लेकर जागरूकता बढ़ी है और सेहत से जुड़े फायदों ने मिट्टी से बने इन देसी उत्पादों की ओर रुझान तेज कर दिया है। इसी वजह से स्थानीय कारीगर इन बोतलों की बिक्री से प्रतिदिन हजारों रुपये का बेहतरीन मुनाफा कमा रहे हैं।

मिट्टी की ये बोतलें पानी को फ्रिज की तरह प्राकृतिक रूप से ठंडा रखती हैं और प्लास्टिक की तुलना में शरीर के लिए कहीं ज्यादा फायदेमंद मानी जाती हैं। यही कारण है कि भीषण गर्मी के इस मौसम में बाजार में इनकी मांग काफी बढ़ गई है।

बड़े शहरों तक पहुंच रहे उत्पाद, अच्छी कीमत

गांवों में कुम्हार दिन-रात मेहनत कर नए और आकर्षक डिजाइनों वाली बोतलें तैयार कर रहे हैं। कई कारीगरों ने साधारण घड़े और कुल्हड़ बनाने के साथ-साथ अब बड़े पैमाने पर इन बोतलों का निर्माण शुरू कर दिया है, जिससे उनकी पारिवारिक आमदनी में बड़ा इजाफा हुआ है। पहले मिट्टी के बर्तनों की मांग सीमित थी, लेकिन अब सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए ये उत्पाद बड़े शहरों तक पहुंच रहे हैं। बाजार में एक मिट्टी की बोतल आसानी से 150 रुपए से लेकर 200 रुपए तक बिक रही है।

प्रशिक्षण और आधुनिक चाक से बदली तस्वीर

पिछले करीब 15 वर्षों से लगातार मिट्टी के बर्तन बना रहे कारीगर योगेंद्र प्रजापति ने बताया कि विशेष प्रशिक्षण लेने के बाद अब वे मिट्टी की बोतलें भी तैयार कर रहे हैं।

उन्होंने बताया कि खादी ग्रामोद्योग विभाग की ओर से उन्हें बर्तन बनाने वाली आधुनिक इलेक्ट्रिक चाक उपलब्ध कराई गई है। पहले जहां हाथ से चाक चलानी पड़ती थी, वहीं अब बिजली से चलने वाली चाक की वजह से समय की भारी बचत होती है और कम समय में ज्यादा उत्पाद बन जाते हैं।

मेहनत भरी है बोतल बनाने की प्रक्रिया

योगेंद्र के मुताबिक, मिट्टी की बोतल बनाना काफी मेहनत भरा काम है। सबसे पहले उच्च गुणवत्ता वाली चिकनी मिट्टी लाई जाती है। फिर मिट्टी को अच्छी तरह गूंथकर इलेक्ट्रिक चाक पर बोतल का सुंदर आकार दिया जाता है। आकार देने के बाद इसे धूप में भली-भांति सुखाया जाता है और अंत में भट्ठे की तेज आंच में पकाया जाता है, जिसके बाद यह मजबूत और आकर्षक बोतल बाजार में बिकने के लिए पूरी तरह तैयार हो जाती है।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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