कैंसर को मात देकर हरियाली से जुड़े कोडरमा के 71 वर्षीय शिक्षाविद्, कबाड़ से सजाया 'मीनाक्षी गार्डन' झारखंड 3 महीने पहले 44
कोडरमा के झुमरी तिलैया निवासी डॉ. अरुण मिश्रा ने बेकार वस्तुओं से एक खूबसूरत मीनाक्षी गार्डन तैयार किया है. कैंसर की चौथी स्टेज से उबर चुके इस शिक्षाविद् के लिए बगीचे की हरियाली किसी थेरेपी से कम नहीं रही.

विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर जब दुनियाभर में प्रकृति संरक्षण और संवर्धन को लेकर तरह-तरह के आयोजन हो रहे हैं, उसी समय कोडरमा के झुमरी तिलैया स्थित देवी मंडप रोड के रहने वाले 71 वर्षीय शिक्षाविद् डॉ. अरुण मिश्रा अपने अनोखे प्रयास से एक मिसाल कायम कर रहे हैं. उन्होंने अपने घर के परिसर में फेंकने लायक और बेकार पड़ी चीज़ों को नया रूप देकर एक आकर्षक और हराभरा मीनाक्षी गार्डन तैयार किया है, जो आज लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुका है.

बेकार वस्तुओं से संवारा बगीचा

डॉ. अरुण मिश्रा बताते हैं कि कुछ साल पहले वे चंडीगढ़ की सैर पर गए थे, जहां उन्होंने मशहूर रॉक गार्डन देखा. इस उद्यान में कबाड़ और बेकार वस्तुओं को कलात्मक स्वरूप देकर सुंदर बगीचा बनाया गया है. रॉक गार्डन की इसी सोच ने उन्हें यह प्रेरणा दी कि घर में पड़ी अनुपयोगी चीज़ों को फेंकने के बजाय उनका रचनात्मक उपयोग किया जाए और हरियाली को बढ़ावा दिया जाए.

इसके बाद उन्होंने घर में रखी पुरानी प्लास्टिक की बोतलें, पानी के जार, गाड़ियों के पुराने टायर, टूटे बाथ टब, बेकार हैंड बेसिन, पुराने शौचालय कमोड और फ्लश बॉक्स जैसी वस्तुओं को पौधे लगाने और बगीचे को सजाने के काम में लाना शुरू कर दिया. आज यही कबाड़ उनके गार्डन की शोभा बढ़ा रहा है और उनका यह प्रयास 'वेस्ट को बेस्ट' बनाने का बेहतरीन उदाहरण पेश कर रहा है.

हरियाली बनी कैंसर में थेरेपी

अपने जीवन के एक मुश्किल दौर को याद करते हुए डॉ. मिश्रा ने बताया कि उन्हें कैंसर की चौथी स्टेज का सामना करना पड़ा था. उस वक्त चिकित्सकों ने उनके ठीक होने की संभावना बेहद कम बताई थी. इसके बाद उन्होंने प्रकृति के बीच ज़्यादा समय बिताना शुरू किया और रोज़ाना अपने बगीचे में पेड़-पौधों की देखभाल में जुट गए.

उनका कहना है कि बगीचे में लगे दर्जनों किस्म के गुलाब, रंग-बिरंगे फूल और हरे-भरे पौधों ने उन्हें हमेशा सकारात्मक ऊर्जा दी. फूलों की महक और प्रकृति की शांति उनके लिए किसी थेरेपी से कम नहीं रही. वे मानते हैं कि प्रकृति के साथ बिताया गया समय मानसिक और शारीरिक दोनों तरह की सेहत के लिए फायदेमंद होता है. आज वे कैंसर से उबर चुके हैं और इसका बड़ा श्रेय वे प्रकृति से अपने जुड़ाव को देते हैं.

हर हाथ लगाए एक पौधा तो खड़े होंगे करोड़ों पेड़

डॉ. मिश्रा ने पर्यावरण संरक्षण के लिए लोगों से आगे आने की अपील की. उन्होंने कहा कि गर्मी के दिनों में हर कोई पेड़ों की छांव ढूंढता है और अपनी गाड़ियां भी पेड़ों के नीचे खड़ी करना पसंद करता है, मगर पौधे लगाने को लेकर उतनी गंभीरता नहीं दिखाता.

उन्होंने कहा कि देश की आबादी लगभग 140 करोड़ है. अगर हर व्यक्ति सिर्फ एक पौधा भी लगाए और उसकी देखभाल करे, तो देश में 140 करोड़ नए पेड़ खड़े हो सकते हैं, जो पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि होगी.

जिम्मेदारी हर नागरिक की

डॉ. मिश्रा का मानना है कि आज अधिकांश लोग चाहते हैं कि पर्यावरण संरक्षण का काम कोई और करे, जबकि असल में यह जिम्मेदारी हर नागरिक की है. अगर हर इंसान अपनी जिम्मेदारी समझे, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ और सुरक्षित पर्यावरण सुनिश्चित किया जा सकता है.

उन्होंने यह भी बताया कि उनके गार्डन में लगे पौधों के लिए किसी रासायनिक खाद का इस्तेमाल नहीं किया जाता. पौधों को ज़रूरी पोषण देने के लिए गौशाला से मिलने वाली गोबर की जैविक खाद का उपयोग किया जाता है, जिससे पौधे स्वस्थ रहते हैं और पर्यावरण भी प्रदूषण से मुक्त बना रहता है.

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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