वोटर लिस्ट में बड़े पैमाने पर सफाई: 30 राज्यों से 13 करोड़ नाम हटाए गए, दिल्ली और महाराष्ट्र में बड़ा असर राष्ट्रीय राजनीति एक घंटा पहले 5
चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान के तहत देश की मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से अधिक फर्जी और अयोग्य नाम हटा दिए गए हैं, जिसका सबसे अधिक प्रभाव दिल्ली और महाराष्ट्र में देखा गया है।

चुनाव आयोग के अभियान से बदली तस्वीर

चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण, जिसे SIR के नाम से जाना जाता है, ने पूरे देश की मतदाता सूचियों की दशा और दिशा बदल दी है। जून 2025 में शुरू की गई इस व्यापक कवायद का उद्देश्य चुनावी डेटा को शुद्ध करना और फर्जी वोटर्स को हटाना था। इस प्रक्रिया का असर अब 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में साफ तौर पर दिखाई दे रहा है। आंकड़ों के मुताबिक, इन क्षेत्रों के ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से अब तक 13 करोड़ से ज्यादा अयोग्य और संदिग्ध मतदाताओं के नाम हटाए जा चुके हैं।

दिल्ली और महाराष्ट्र में दिखा बड़ा बदलाव

सोमवार को जब दिल्ली और महाराष्ट्र की नई ड्राफ्ट वोटर लिस्ट सामने आई, तो उसके आंकड़े काफी चौंकाने वाले रहे। दिल्ली में मतदाताओं की संख्या में 32.8 फीसदी की भारी गिरावट देखी गई है। पहले यहां लगभग 1.45 करोड़ मतदाता दर्ज थे, जो अब घटकर मात्र 97.53 लाख रह गए हैं। वहीं महाराष्ट्र का हाल भी कुछ ऐसा ही है, जहां 21.1 फीसदी नाम सूची से बाहर किए गए हैं। राज्य में मतदाताओं की संख्या पहले 9.78 करोड़ थी, जो अब सिमटकर 7.71 करोड़ के स्तर पर आ गई है।

तीसरे चरण का व्यापक असर

SIR प्रक्रिया के तीसरे चरण में कुल 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को शामिल किया गया था, जिसमें अब तक 6.15 करोड़ नाम हटाए जा चुके हैं। चुनाव आयोग ने 14 मई को इस तीसरे चरण की घोषणा की थी, जिसमें 16 राज्य और 3 केंद्र शासित प्रदेश शामिल थे। इनमें से 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने अपने ड्राफ्ट रोल का प्रकाशन कर दिया है। हालांकि, नागालैंड और त्रिपुरा में अभी भी गिनती का चरण पूरा होना बाकी है, जो अगले दो महीनों में शुरू होगा। इस प्रक्रिया में मतदाताओं की पात्रता की कड़ी जांच की जा रही है और जो लोग तय मानकों पर खरे नहीं उतरते, उन्हें सूची से बाहर कर दिया जाता है।

क्यों हटाए गए इतने नाम?

महाराष्ट्र में मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) कार्यालय द्वारा जारी एक बयान के अनुसार, मतदाता सूची से नाम हटने के पीछे कई कारण रहे हैं। सूची से हटाए गए नामों में 3.56 फीसदी मृत लोग, 15.78 फीसदी वे लोग जो स्थायी रूप से कहीं और चले गए या अनुपस्थित थे, और 1.81 फीसदी वे थे जिनका नाम एक से अधिक जगहों पर दर्ज था। दिल्ली का डेटा भी इसी तरह के रुझान दिखाता है। यहां लगभग 29.86 फीसदी मतदाता अनुपस्थित या स्थानांतरित श्रेणी में पाए गए, 1.95 फीसदी मृत थे और 0.98 फीसदी लोगों का पंजीकरण एक से अधिक स्थानों पर पाया गया था।

अगले कदम और सुधार का मौका

चुनाव आयोग की गाइडलाइंस के मुताबिक, यदि किसी नागरिक का नाम गलत तरीके से ड्राफ्ट रोल से हटाया गया है, तो वे अगले एक महीने के भीतर फाइनल रोल में शामिल होने के लिए अपना आवेदन दे सकते हैं। इस प्रक्रिया की शुरुआत पिछले साल जून में बिहार से हुई थी। इसके बाद अक्टूबर 2025 में दूसरा राउंड शुरू हुआ, जिसमें 9 राज्य और 3 केंद्र शासित प्रदेश शामिल थे।

किन राज्यों में अभी SIR नहीं हुआ?

कुछ क्षेत्रों में प्रशासनिक और भौगोलिक कारणों से अभी भी यह कवायद नहीं हो पाई है। इसमें हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर शामिल हैं, जहां जनगणना और मौसम की बाधाओं के चलते इसे बाद में करने का निर्णय लिया गया है। इसके अलावा, असम में भी चुनाव आयोग ने फिलहाल इसे रोक रखा है, क्योंकि वहां नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (NRC) की लंबित सूची का प्रकाशन होना अभी बाकी है। अब तक तीनों चरणों को मिलाकर कुल 13.37 करोड़ नाम हटाए गए हैं, जो पिछली सूची के मुकाबले 14.1 फीसदी की कटौती दर्शाते हैं।

विभिन्न राज्यों में कटौती का प्रतिशत

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, कटौती का प्रतिशत अलग-अलग क्षेत्रों में इस प्रकार रहा है:

  • दिल्ली में सबसे अधिक 32.80 फीसदी नाम हटाए गए।
  • दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव में यह आंकड़ा 29.60 फीसदी रहा।
  • तेलंगाना में 21.70 फीसदी नामों की कटौती हुई।
  • महाराष्ट्र में 21.10 फीसदी नाम हटाए गए।
  • अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में 20.60 फीसदी नाम कम किए गए।

पुरानी व्यवस्था बनाम SIR

पिछले दो दशकों से चुनाव आयोग मुख्य रूप से 'विशेष संक्षिप्त संशोधन' (Special Summary Revision) करता आ रहा था, जिसमें सालाना आधार पर लिस्ट में कुछ नाम जोड़े या हटाए जाते थे। लेकिन SIR में चुनाव आयोग ने एक नई और सख्त प्रक्रिया अपनाई है। इसके तहत सभी पंजीकृत मतदाताओं को एक महीने की समय सीमा के भीतर एन्यूमरेशन फॉर्म जमा करने होते हैं। इसके साथ ही उन्हें अपने और अपने परिवार के सदस्यों के नाम को 2000 के दशक की शुरुआत में हुए गहन संशोधन की सूची के साथ 'मैप' करना होता है और अपनी पात्रता साबित करने के लिए उचित दस्तावेज पेश करने होते हैं।

कानूनी चुनौती और सुप्रीम कोर्ट

इस प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी कानूनी जंग लड़ी गई थी। कुछ याचिकाओं में 24 जून, 2025 के चुनाव आयोग के आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें आयोग की शक्तियों पर सवाल खड़े किए गए थे। हालांकि, इस साल मई में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में चुनाव आयोग के इस SIR आदेश को पूरी तरह सही और वैध करार दिया, जिससे इस प्रक्रिया के आगे बढ़ने का रास्ता साफ हो गया।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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