ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच तनातनी, भारत के लिए कूटनीतिक परीक्षा राष्ट्रीय राजनीति 2 घंटे पहले 10
भारत की अध्यक्षता में आयोजित हो रहे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में पश्चिम एशिया का बढ़ता तनाव एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है, जहां ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के अलग-अलग हितों के बीच संतुलन बनाना भारत के लिए बड़ी कूटनीतिक अग्निपरीक्षा है।

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन पर पश्चिम एशिया संकट का साया

भारत की मेजबानी में 12 और 13 सितंबर को आयोजित होने वाला BRICS शिखर सम्मेलन इस बार केवल आर्थिक और व्यापारिक चर्चाओं तक सीमित नहीं रहने वाला है। वैश्विक मंच पर अपनी मजबूती साबित करने के प्रयास में जुटे इस संगठन के सामने पश्चिम एशिया का गहराता संकट एक बड़ी बाधा के रूप में खड़ा है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इस बार BRICS के दो महत्वपूर्ण सदस्य, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE), इस क्षेत्रीय संकट को लेकर बिल्कुल अलग-अलग रणनीतिक प्राथमिकताएं रखते हैं।

भारत के सामने कूटनीतिक चुनौती

भारत के लिए वर्तमान स्थिति किसी बड़ी कूटनीतिक चुनौती से कम नहीं है। मेजबान होने के नाते भारत का प्रयास यह है कि वह किसी एक देश का पक्ष लेते हुए न दिखे, बल्कि एक ऐसी साझा भाषा और मंच तैयार करे जिस पर ईरान और संयुक्त अरब अमीरात दोनों सहमति व्यक्त कर सकें। यह साझा सहमति BRICS की संयुक्त घोषणा पत्र के लिए अनिवार्य है। संगठन के विस्तार के बाद से सदस्य देशों के हित काफी विविध हो गए हैं, जिससे किसी भी संवेदनशील मुद्दे पर आम सहमति बनाना पहले की तुलना में अधिक जटिल प्रक्रिया हो गई है।

पहले भी बनी थी असहमति

यह मुद्दा पहली बार सामने नहीं आया है। इससे पहले, इसी साल अप्रैल में जब BRICS देशों की बैठक हुई थी, तब भी पश्चिम एशिया के संकट पर सदस्य देशों के बीच पूर्ण तालमेल नहीं बन पाया था। उस समय भी आम राय बनाने में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था। अब भारत की पूरी कोशिश है कि 12 और 13 सितंबर के मुख्य शिखर सम्मेलन से पहले ऐसी कूटनीतिक शब्दावली तैयार की जाए जिसे ईरान और यूएई दोनों स्वीकार कर सकें।

प्रधानमंत्री मोदी की संतुलित कूटनीति

भारत ने इस पूरे घटनाक्रम में अब तक बेहद संतुलित रुख बनाए रखा है। हाल ही में संपन्न हुए SCO शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन से हुई थी। उस दौरान प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया था कि क्षेत्र में चल रहे संकट का समाधान केवल बातचीत और कूटनीति के माध्यम से ही निकाला जाना चाहिए। इसके साथ ही भारत ने समुद्री व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा और जहाजों की निर्बाध आवाजाही पर विशेष जोर दिया था।

यूएई के साथ मजबूत संबंध

ईरान के साथ संवाद के साथ-साथ, संयुक्त अरब अमीरात के साथ भारत के प्रगाढ़ संबंध भी इस मामले में अहम कड़ी हैं। जून के महीने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नहयान के साथ हुई बातचीत में भी भारत ने शांति का संदेश दिया था। भारत ने अंतरराष्ट्रीय कानूनों के सम्मान, संप्रभुता की सुरक्षा और विशेष रूप से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में सुरक्षित नौवहन सुनिश्चित करने की वकालत की थी। अब देखने वाली बात यह होगी कि क्या भारत इन दोनों देशों को एक ही मंच पर लाने में सफल हो पाता है या नहीं।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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