राजस्थान
एक घंटा पहले
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विचारों
करौली जिले का सनेट गांव कभी गंदगी और कचरे के ढेरों के लिए जाना जाता था, लेकिन आज यही गांव स्वच्छता की एक ऐसी मिसाल बन चुका है जिसकी चर्चा हर ओर हो रही है। जिला मुख्यालय से करीब 28 किलोमीटर की दूरी पर बसा यह गांव अब अपनी बेहतरीन साफ-सफाई, सुंदरता और ग्रामीणों की सामूहिक जनभागीदारी के बल पर बड़े शहरों को भी पीछे छोड़ता नजर आता है।
हर घर और दुकान के बाहर डस्टबिन
करीब 5 हजार की आबादी वाला यह छोटा सा गांव आज जिले की दूसरी ग्राम पंचायतों के लिए रोल मॉडल बन गया है। यहां की सबसे खास बात यह है कि हर घर और बाजार की हर दुकान के बाहर कचरा पात्र यानी डस्टबिन लगाए गए हैं। गांव की गलियां और मुख्य सड़कें इतनी स्वच्छ और व्यवस्थित दिखती हैं कि पहली नजर में यह किसी पिछड़े गांव का नहीं, बल्कि किसी आधुनिक शहरी कॉलोनी का नजारा प्रतीत होता है।
ग्रामीणों की सजगता बनी पहचान
सनेट गांव के लोगों में साफ-सफाई को लेकर इतना जुनून और जिम्मेदारी का भाव है कि अगर रास्ते में कागज का छोटा टुकड़ा या कोई रैपर भी गिरा दिख जाए, तो वहां से गुजरता कोई भी ग्रामीण उसे तुरंत उठाकर डस्टबिन में डाल देता है। ग्रामीणों की यही जागरूक आदत गांव को हर दिन स्वच्छ बनाए रखती है।
गौरव पथ और हरियाली बनी शान
ग्राम पंचायत के बीचों-बीच गुजरने वाला गौरव पथ आज इस गांव की सबसे खूबसूरत पहचान बन चुका है। साफ-सुथरी सड़कें, व्यवस्थित माहौल और चारों ओर फैली हरियाली इस मार्ग की सुंदरता को और बढ़ा देती है। ग्रामीणों ने समझदारी दिखाते हुए घरों से निकलने वाले गंदे पानी के निपटारे के लिए बने सोख्ता गड्ढों यानी सोक पिट्स के आस-पास सुंदर पौधे भी लगा दिए हैं, जिससे वह जगह भी हरी-भरी और आकर्षक नजर आने लगी है।
गीले कचरे से बनती है जैविक खाद
यहां स्वच्छता केवल दिखावे या किसी अभियान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे जमीनी स्तर पर एक व्यवस्थित और वैज्ञानिक प्रबंधन काम करता है। ग्रामीण घरों से निकलने वाले गीले कचरे जैसे सब्जी के छिलके और बचा हुआ खाना से बढ़िया जैविक खाद तैयार करते हैं, जिसका इस्तेमाल खेती और पेड़-पौधों के लिए होता है। वहीं प्लास्टिक और दूसरे सूखे कचरे को इधर-उधर फेंकने के बजाय घर के बाहर रखे तय कचरा पात्र में ही डाला जाता है।
रोज आती है कचरा गाड़ी
गांव में स्वच्छता की यह व्यवस्था किसी आधुनिक शहर से कम नहीं है, जहां हर दिन नियमित रूप से कचरा संग्रहण वाहन आता है और संगीत बजाते हुए घर-घर से कचरा एकत्र करता है। सरपंच अनिल चौधरी इस बदलाव के सफर को याद करते हुए बताते हैं कि साल 2020 से पहले हालात पूरी तरह अलग थे। नियमित सफाई न होने के कारण गांव के कोने-कोने में गंदगी और कचरे के ढेर लगे रहते थे, लेकिन सरपंच की जिम्मेदारी संभालते ही उन्होंने स्वच्छता को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता बनाया और इसका नतीजा आज सबके सामने है।
आदतें बदलना नहीं था आसान
शुरुआत में सालों पुरानी आदतों को बदलना और लोगों को स्वच्छता का महत्व समझाना आसान नहीं था। लेकिन बिना हार माने लगातार किए गए व्यक्तिगत प्रयासों और गांव में चलाए गए अनूठे जागरूकता अभियानों का असर आखिरकार दिखने लगा। धीरे-धीरे ग्रामीणों को बात समझ आने लगी और देखते ही देखते पूरा गांव खुद इस स्वच्छता अभियान से जुड़ता चला गया। लोगों के इसी सामूहिक जुड़ाव ने इस मुश्किल काम को मुमकिन कर दिखाया।
संस्थाओं के सहयोग से बदली तस्वीर
उपसरपंच जीतेंद्र सिंह जादौन के अनुसार, एनएसई फाउंडेशन के सहयोग से फिनिश सोसाइटी ने गांव में स्वच्छता अभियान को एक नई और मजबूत दिशा दी। इस बदलाव को जमीन पर उतारने के लिए लगातार जागरूकता रैलियां, तरह-तरह की प्रतियोगिताएं और कई जन-जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए गए। इन्हीं सामूहिक प्रयासों का परिणाम था कि धीरे-धीरे लोगों की सोच बदली और साफ-सफाई सनेट गांव के लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी और संस्कृति का अटूट हिस्सा बन गई।
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