लोकगीत के पीछे छिपा राजपूताना का अद्भुत इतिहास: जानिए 'आगे-आगे कोतल घोड़लो' का मतलब राजस्थान 2 महीने पहले 73
राजस्थान का चर्चित लोकगीत 'आगे-आगे कोतल घोड़लो' महज मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह मारवाड़ की एक चतुर युद्धनीति को दर्शाता है।

युद्धनीति और ऐतिहासिक किस्सा

राजस्थान की लोक संस्कृति में रचा-बसा गीत आगे-आगे कोतल घोड़लो राज्य के गौरवशाली और रणनीतिक इतिहास को बयां करता है। इस गीत के पीछे की कहानी जोधपुर के शासक महाराजा अभय सिंह के समय की है, जो राजपूताना की बुद्धिमानी को दर्शाती है।

क्या था घोड़ों का रहस्य

ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, जब जोधपुर के महाराजा अभय सिंह ने जयपुर के शासकों को 600 घोड़े बेचे, तो उसके पीछे एक गहरी साजिश थी। महाराजा ने इन घोड़ों को पहले से ही ढोल की थाप पर नाचने का विशेष प्रशिक्षण दे रखा था। उस समय की युद्धनीति में यह एक अनूठा प्रयोग था।

कैसे काम आई यह रणनीति

जब युद्ध का समय आया, तो जयपुर की सेना ने उन घोड़ों का इस्तेमाल करना चाहा। लेकिन जैसे ही रणभूमि में ढोल बजे, प्रशिक्षण के कारण वे घोड़े युद्ध करने के बजाय नाचने लगे। इस स्थिति ने जयपुर की सेना की पूरी रणनीति को बिगाड़ दिया और वे रक्षात्मक स्थिति में आ गए। इसी घटना के बाद से कोतल घोड़ा राजपूताना की शाही परंपरा और लोक कथाओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। आज भी यह गीत राजस्थान के शौर्य और चतुर युद्ध कौशल की याद दिलाता है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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