28 साल बाद वांधामा नरसंहार की गूंज: 23 कश्मीरी पंडितों की हत्या के मामले की फिर से शुरू हुई जांच जम्मू-कश्मीर 3 घंटे पहले 7
जम्मू-कश्मीर की स्टेट इन्वेस्टिगेटिंग एजेंसी ने 1998 के वांधामा नरसंहार की फाइल फिर से खोल दी है, जिसमें 23 कश्मीरी पंडितों की निर्मम हत्या कर दी गई थी। इसके साथ ही प्रशासन ने 1989 की चर्चित हत्याओं और अन्य आतंकी मामलों में भी न्याय प्रक्रिया तेज कर दी है।

वांधामा नरसंहार की जांच में नई तेजी

जम्मू-कश्मीर की स्टेट इन्वेस्टिगेटिंग एजेंसी जिसे संक्षेप में SIA कहा जाता है, ने घाटी में आतंकवाद के काले दौर के दौरान हुई टारगेटेड किलिंग यानी चुनिंदा हत्याओं के लंबे समय से लंबित मामलों को सुलझाने की कवायद शुरू कर दी है। इसी कड़ी में एजेंसी ने साल 1998 में हुए वांधामा नरसंहार की जांच को फिर से सक्रिय किया है। इस वीभत्स आतंकी घटना में कुल 23 कश्मीरी पंडितों को मौत के घाट उतार दिया गया था। आधिकारिक सूत्रों ने पुष्टि की है कि SIA ने हाल ही में इस मामले की कड़ियों को जोड़ने के लिए कश्मीर घाटी में कई ठिकानों पर छापेमारी की है। जांच दल का मुख्य उद्देश्य उन आतंकवादियों और उनके मददगारों जिन्हें ओवर-ग्राउंड वर्कर्स कहा जाता है, की पहचान करना है जिन्होंने इस साजिश को अंजाम दिया था।

क्या था वांधामा का वह खौफनाक मंजर

यह घटना 25 जनवरी 1998 की रात को घटी थी। उस समय गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या थी और रमजान का पवित्र महीना चल रहा था। रात के अंधेरे में भारी हथियारों से लैस आतंकवादी गांदरबल जिले के वांधामा गांव में उन कुछ चुनिंदा कश्मीरी पंडित परिवारों के घरों में घुस गए जो वहां रह गए थे। आतंकियों ने वहां बेहद बेरहमी का परिचय देते हुए 9 महिलाओं और 4 बच्चों समेत कुल 23 निर्दोष लोगों की गोली मारकर हत्या कर दी। इस हमले ने गांव में बची-खुची कश्मीरी पंडितों की आबादी को पूरी तरह खत्म कर दिया था। उस पूरी रात में केवल एक किशोर ही जीवित बच पाया था। गांदरबल पुलिस स्टेशन में घटना के तुरंत बाद FIR तो दर्ज कर ली गई थी, लेकिन दुर्भाग्यवश यह मामला लगभग 3 दशकों तक अनसुलझा ही बना रहा।

टीका लाल टपलू और जस्टिस गंजू की हत्याओं की पड़ताल

वांधामा मामले की जांच के अलावा, SIA ने आतंकवाद के शुरुआती चरण में कश्मीरी पंडितों पर हुए अन्य हाई-प्रोफाइल हमलों की फाइलों को भी खंगालना शुरू कर दिया है। पहली बड़ी घटना 13 सितंबर 1989 की है, जिसमें भारतीय जनता पार्टी के तत्कालीन उपाध्यक्ष और नामी वकील टीका लाल टपलू की हत्या कर दी गई थी। उन्हें श्रीनगर में उनके घर के ठीक बाहर निशाना बनाया गया था। यह उन शुरुआती आतंकी हमलों में से एक था जिसने घाटी में समुदाय के विरुद्ध एक व्यवस्थित अभियान की नींव रखी थी। दूसरी घटना 4 नवंबर 1989 की है, जिसमें सेवानिवृत्त जज जस्टिस नीलकंठ गंजू की हत्या कर दी गई थी। वे वही जज थे जिन्होंने JKLF के संस्थापक मकबूल भट को फांसी की सजा सुनाई थी। जस्टिस गंजू को श्रीनगर की व्यस्त हरि सिंह स्ट्रीट पर संदिग्ध आतंकवादियों ने गोलियों से छलनी कर दिया था।

सरला भट और अन्य मामलों में ठोस प्रगति

पुराने मामलों को दोबारा खोलने का निर्णय इसलिए लिया गया है क्योंकि हाल के दिनों में कई महत्वपूर्ण सुराग हाथ लगे हैं। जून 2026 में SIA ने नर्स सरला भट के अपहरण, यातना और हत्या के मामले में 737 पन्नों की एक विस्तृत चार्जशीट दाखिल की थी, जो वर्ष 1990 में हुई थी। इस मामले में जेल में बंद JKLF चीफ यासीन मलिक और अन्य को नामजद किया गया है। इसके अलावा, अगस्त माह में एजेंसी ने लेखक और समाजसेवी सरवानंद कौल प्रेमी तथा उनके पुत्र वीरेंद्र कौल की 1990 में हुई दोहरी हत्या के सिलसिले में केंद्र शासित प्रदेश के 9 अलग-अलग स्थानों पर तलाशी अभियान चलाया। अधिकारियों के अनुसार, कई मामलों में दोषियों और उन्हें पनाह देने वालों तक पहुंचने में एजेंसी को बड़ी कामयाबी मिली है, भले ही इनमें से कुछ अपराधी अब इस दुनिया में नहीं हैं या फरार चल रहे हैं।

एलजी मनोज सिन्हा का न्याय का संकल्प

आतंकवाद से जुड़े इन पुराने और अनसुलझे मामलों पर सरकार का यह कड़ा रुख उपराज्यपाल मनोज सिन्हा द्वारा पीड़ितों को दिए गए आश्वासनों के अनुरूप है। एलजी मनोज सिन्हा ने स्पष्ट किया है कि आतंकवाद के हर पीड़ित परिवार को न्याय दिलाना प्रशासन की प्राथमिकता है। उनका कहना है कि जवाबदेही और पीड़ितों के पुनर्वास के लिए अब और लंबा इंतजार नहीं होगा। प्रशासन यह सुनिश्चित करने में जुटा है कि प्रभावित हर परिवार को मदद मिले और लंबित मामलों की जांच कर दोषियों को कड़ी सजा दी जाए। एलजी सिन्हा का साफ संदेश है कि जब तक हर पीड़ित परिवार को न्याय नहीं मिल जाता, तब तक प्रशासन चैन से नहीं बैठेगा।

प्रशासन की ओर से उठाए गए कड़े कदम

जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने आतंकवाद के उस दौर में पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए कई व्यावहारिक और कड़े कदम उठाए हैं। इनमें पीड़ित परिवारों के सदस्यों को सरकारी नौकरी देना, उन मामलों में नई FIR दर्ज करना जिनमें पहले कार्रवाई नहीं हुई थी, और कश्मीरी पंडितों की अवैध रूप से कब्जाई गई संपत्तियों को वापस दिलाना शामिल है। सरकार उस संपूर्ण आतंकी इकोसिस्टम को ध्वस्त करने के लिए काम कर रही है जिसने दशकों तक पीड़ितों की आवाज को दबाकर रखा था। वर्तमान में जांच एजेंसियां लगातार सबूत जुटा रही हैं, प्रत्यक्षदर्शियों से पूछताछ कर रही हैं और पुराने सुरागों का पीछा कर रही हैं ताकि दोषियों को कानून के शिकंजे में लाया जा सके।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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