राजस्थान
6 दिन पहले
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जयपुर के ऐतिहासिक चारदीवारी क्षेत्र में बसा ठठेरों का रास्ता आज भी तांबे, पीतल और कांसे के हस्तनिर्मित बर्तनों के लिए पहचाना जाता है। यहां के कारीगर पीढ़ियों से इस परंपरागत कला को संभाले हुए हैं, मगर अब वे सरकार से संरक्षण की गुहार लगा रहे हैं।
तीन पीढ़ियों से जुड़ी विरासत
इसी रास्ते पर पहुंचकर यहां काम कर रहे कारीगरों से बातचीत की गई। कारीगर विजय कुमार ठठेरा बताते हैं कि वे ठठेरी कला से जुड़ी तीसरी पीढ़ी के कारीगर हैं। उनके परिवार में यह हुनर पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ता रहा।
विजय के अनुसार, उनके दादा धर्मीलाल और उसके बाद उनके पिता बाबूलाल ने करीब 150 वर्षों तक इस कला को जीवित बनाए रखा। यानी यह परंपरा एक लंबे अरसे से उनके परिवार की पहचान रही है।
आमेर से चारदीवारी तक का सफर
विजय बताते हैं कि राजा-महाराजाओं के दौर में उनके पूर्वजों को उनकी इसी ठठेरी कला के कारण आमेर से लाकर जयपुर की चारदीवारी में बसाया गया था। यही वजह है कि यह कला आज भी इस इलाके की रगों में बसी हुई है।
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