जीवनशैली
एक घंटा पहले
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मौजूदा दौर में डिप्रेशन युवाओं के बीच एक तेजी से फैलती मानसिक स्वास्थ्य चुनौती के रूप में सामने आ रहा है। इसकी खास बात यह है कि इसके लक्षण आसानी से नजर नहीं आते, फिर भी यह किसी भी व्यक्ति की जिंदगी पर गहरा असर डालता है। यही वजह है कि अब जानकार इसे एक तरह का 'साइलेंट किलर' मानने लगे हैं। पीएसआरआई हॉस्पिटल की मनोवैज्ञानिक एवं काउंसलर अर्पिता कोहली इस बारे में विस्तार से बता रही हैं कि आखिर युवाओं में डिप्रेशन का दायरा क्यों बढ़ रहा है।
आखिर युवाओं में क्यों फैल रहा है डिप्रेशन
अर्पिता कोहली के मुताबिक, युवाओं में बढ़ते डिप्रेशन के पीछे कोई एक या दो नहीं, बल्कि कई वजहें जिम्मेदार हो सकती हैं। पढ़ाई का दबाव, करियर की चिंता, आर्थिक जिम्मेदारियां, रिश्तों में आने वाला तनाव और अकेलापन — ये सभी मिलकर युवाओं के मानसिक तनाव को तेजी से बढ़ा देते हैं।
सबसे बड़ी मुश्किल क्या है
डिप्रेशन को लेकर सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इससे जूझ रहा व्यक्ति जरूरी नहीं कि उदास या परेशान दिखाई दे। बहुत से लोग ऊपर से खुश और सामान्य नजर आते हैं, जबकि भीतर ही भीतर वे टूट रहे होते हैं। धीरे-धीरे यह हालत व्यक्ति को उदासीनता की ओर धकेल देती है, और गंभीर स्थितियों में आत्महत्या तक के विचार मन में आने लगते हैं।
इन इशारों को कभी न करें नजरअंदाज
अगर आपके किसी करीबी में लगातार उदासी, पहले पसंद आने वाली गतिविधियों में दिलचस्पी का कम होना, लोगों से दूरी बना लेना, पढ़ाई या काम में मन न लगना और बार-बार निराशा का अहसास जैसे लक्षण दिख रहे हों, तो इन्हें हल्के में लेने की भूल नहीं करनी चाहिए।
मन की बात कहने में न झिझकें
विशेषज्ञों का मानना है कि मानसिक सेहत से जुड़ी समस्याओं पर खुलकर बातचीत बेहद जरूरी है। समाज में आज भी मानसिक बीमारियों को लेकर कई भ्रांतियां फैली हुई हैं, जिनके चलते लोग मदद मांगने से कतराते हैं। कई युवा इस डर से अपनी तकलीफ छिपा लेते हैं कि कहीं लोग उन्हें कमजोर न समझ लें, जबकि सही समय पर मिली मदद और इलाज से स्थिति में काफी हद तक सुधार लाया जा सकता है।
जीवनशैली में लाएं सकारात्मक बदलाव
मानसिक स्वास्थ्य को दुरुस्त बनाए रखने के लिए भरपूर नींद, संतुलित खानपान, नियमित शारीरिक गतिविधि के साथ-साथ योग और ध्यान को अपनी दिनचर्या में शामिल करना चाहिए। इसके अलावा अपनी भावनाओं को दबाने के बजाय परिवार, दोस्तों या किसी भरोसेमंद इंसान के साथ साझा करना भी उतना ही जरूरी है। अगर तनाव, चिंता या डिप्रेशन के लक्षण लगातार बने रहें, तो मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक से सलाह लेने में बिल्कुल देर नहीं करनी चाहिए।
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