कैंसर ने छीना पिता का साया, मां ने सिलाई कर पढ़ाया, अब जिगर बनेगा गांव का पहला IITian राजस्थान 14 घंटे पहले 7
ओडिशा के एक छोटे से गांव के जिगर नायक ने जेईई-एडवांस्ड में ऑल इंडिया रैंक 17783 हासिल की है। पिता को कैंसर में खोने के बाद उनकी मां ने टेलरिंग कर बेटे का सपना पूरा किया।

कोटा से एक बार फिर सामाजिक बदलाव की प्रेरक कहानी सामने आई है। यह कहानी ओडिशा के गंजम जिले के छोटे से गांव बाकलीकोड़ा की है, जहां एक मां ने अपने कलेजे के टुकड़े के लिए कठिन संघर्ष किया और बेटे का करियर संवारकर गांव तथा परिवार का नाम रोशन कर दिया। कोटा में दो साल रहकर तैयारी करने वाले छात्र जिगर नायक ने जेईई-एडवांस्ड में ऑल इंडिया रैंक 17783 और ओबीसी-एनसीएल कैटेगरी रैंक 4597 हासिल की है। जेईई-मेन में उन्होंने 98.6143 पर्सेन्टाइल स्कोर किया। इससे पहले 10वीं कक्षा में उन्हें 95% और 12वीं कक्षा में 87% अंक मिले थे।

अपने 'जिगर' के लिए मां की लड़ाई

जिगर नायक की कहानी संघर्ष, त्याग और सपनों की ऐसी मिसाल है, जो हर किसी के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई है। आर्थिक तंगी, पिता का साया उठ जाना और जिम्मेदारियों के बोझ के बावजूद जिगर और उनकी मां अपूर्वा ने हिम्मत नहीं हारी। अपने सपने को पूरा करने के लिए जिगर कोटा पहुंचे और कोचिंग में दाखिला लिया। यहां दो साल की कड़ी मेहनत के बाद आखिरकार उन्हें कामयाबी मिली और अब वे अपने गांव तथा परिवार के पहले आईआईटीयन बनने जा रहे हैं।

पिता के निधन के बाद टूटा परिवार

जिगर के पिता जूरीनाथ गुजरात में टेक्सटाइल इंडस्ट्री में काम करते थे। सब कुछ ठीक चल रहा था कि अचानक उन्हें कैंसर होने की जानकारी मिली। लंबे इलाज में परिवार की सारी जमा-पूंजी खर्च हो गई और 2020 में जिगर के पिता का निधन हो गया। घर की आर्थिक हालत पहले से ही कमजोर थी और पिता के जाने के बाद परिवार पूरी तरह बिखर गया। लेकिन मां अपूर्वा नायक ने हालात के सामने घुटने नहीं टेके। उन्होंने ठान लिया कि चाहे जितनी भी कठिनाइयां आएं, वे बेटे के सपने को टूटने नहीं देंगी।

घर और पढ़ाई, दोनों की जिम्मेदारी

अपूर्वा ने परिवार को संभालने के साथ-साथ बेटे की पढ़ाई की जिम्मेदारी भी अपने कंधों पर ले ली। उन्होंने गोल्ड लोन लिया और घर-घर से सिलाई का काम लेकर टेलरिंग शुरू कर दी। दिनभर सिलाई मशीन पर मेहनत कर वे घर का खर्च चलातीं और जिगर की पढ़ाई के लिए पैसे जुटातीं। कई बार आर्थिक परेशानियां इतनी बढ़ जाती थीं कि घर चलाना मुश्किल हो जाता था, फिर भी मां ने कभी बेटे को इसका एहसास नहीं होने दिया।

सोशल मीडिया से मिली जेईई की राह

जिगर बताते हैं कि 10वीं कक्षा तक उन्हें जेईई परीक्षा के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी। सोशल मीडिया पर इंजीनियरिंग और जेईई एग्जाम से जुड़े वीडियो देखने के बाद ही उन्हें पहली बार इस परीक्षा के बारे में पता चला। तभी उनके मन में आईआईटीयन बनने का सपना जागा और उन्होंने तय किया कि वे पढ़ाई के दम पर अपनी मां की जिंदगी बदलकर रहेंगे। इसके बाद जिगर कोटा आए और पिछले दो वर्षों तक एलन में रेगुलर क्लासरूम स्टूडेंट के रूप में जेईई की तैयारी की। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण उन्हें 11वीं और 12वीं कक्षा में फीस में छूट भी मिली। जिगर का एक छोटा भाई भी है, जो फिलहाल सातवीं कक्षा में पढ़ रहा है।

'परिवार के भविष्य के लिए कर रहा हूं मेहनत'

जिगर ने कहा कि वे सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि अपने पूरे परिवार के भविष्य के लिए मेहनत कर रहे हैं। उनका कहना है कि वे चाहते हैं कि आईआईटी में पढ़ाई पूरी करने के बाद उनकी मां को संघर्ष न करना पड़े और छोटे भाई की पढ़ाई भी बिना किसी परेशानी के पूरी हो सके।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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