बुरहानपुर के किसान ने बदली तकदीर, पत्नी की सलाह पर केमिकल खेती छोड़ शुरू की प्राकृतिक खेती भारत एक घंटा पहले 4
मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले के एक किसान ने अपनी पत्नी से प्रेरित होकर रासायनिक खेती का रास्ता छोड़ दिया है और अब प्राकृतिक विधि से खेती कर बेहतर मुनाफा कमा रहे हैं।

बदलाव की प्रेरणा

मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले में कृषि के क्षेत्र में एक सुखद बदलाव देखने को मिल रहा है। यहाँ के किसान अब हानिकारक रसायनों और कीटनाशकों का मोह त्यागकर प्राकृतिक खेती की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। रसायनों के बिना होने वाली इस खेती में न केवल लागत कम आती है, बल्कि उपज की गुणवत्ता बेहतर होने के कारण बाजार में इसकी मांग भी काफी अधिक है। आज हम आपको एक ऐसे ही जागरूक किसान की कहानी से रूबरू करा रहे हैं, जिन्होंने अपनी जीवनशैली और खेती का तरीका पूरी तरह से बदल दिया है।

पत्नी से मिली सफलता की राह

इस अनूठी पहल की शुरुआत एक झिरा गांव के किसान सुपडू चौहान ने की है। सुपडू चौहान ने बताया कि करीब 8 साल पहले तक वे अन्य किसानों की तरह ही रासायनिक खाद और महंगे कीटनाशकों का अंधाधुंध उपयोग कर रहे थे। इस दौरान उनकी पत्नी एक स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं, जहाँ उन्हें प्राकृतिक और जैविक खेती के तौर तरीकों का बारीकी से प्रशिक्षण मिला। जब उनकी पत्नी ने उन्हें प्राकृतिक खेती के दीर्घकालिक लाभों और स्वास्थ्य के लिए इसके महत्व के बारे में विस्तार से समझाया, तो सुपडू चौहान ने इसे अपनाने का दृढ़ निश्चय किया। उन्होंने अपने खेतों से रासायनिक खाद को पूरी तरह से अलविदा कह दिया और जैविक पद्धति को अपना लिया।

खुद तैयार करते हैं खाद

अपनी शैक्षणिक योग्यता के बारे में बात करते हुए सुपडू चौहान बताते हैं कि उन्होंने 12वीं कक्षा तक की पढ़ाई की है। पिछले 8 वर्षों से वे निरंतर प्राकृतिक खेती कर रहे हैं। वे अपने खेत में मुख्य रूप से तुअर, मक्का और विभिन्न प्रकार की हरी सब्जियां उगाते हैं। खेती की लागत को न्यूनतम रखने के लिए उन्होंने बाहरी बाजार पर निर्भरता खत्म कर दी है। इसके बजाय, वे अपने खेत में ही केंचुआ खाद और वर्मी कंपोस्ट तैयार करते हैं, जो मिट्टी की उर्वरता को प्राकृतिक रूप से बढ़ाता है। वहीं, फसल को कीटों से सुरक्षित रखने के लिए वे नीम अस्त्र का छिड़काव करते हैं।

स्थानीय स्तर पर बढ़ी मांग

प्राकृतिक खेती के फायदों पर बात करते हुए किसान ने बताया कि बाजार में बिकने वाली महंगी रसायनों वाली खाद का खर्च बचने से उनकी बचत बढ़ गई है। उनकी उपज में मिठास और शुद्धता होने की वजह से ग्राहक खुद चलकर उनके घर या खेत तक आते हैं। वे बताते हैं कि उन्हें अपना आटा और दाल बेचने के लिए मंडियों में परेशान होने की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि लोग सीधे उनसे ही खरीदारी करना पसंद करते हैं।

दूसरों के लिए बने प्रेरणास्रोत

सुपडू चौहान अब न केवल खुद समृद्ध हो रहे हैं, बल्कि दूसरों को भी रोजगार मुहैया करा रहे हैं। वे कुल 5 एकड़ भूमि पर मिश्रित खेती करते हैं, जिसमें सब्जियां भी शामिल हैं। उनके इस उपक्रम से गांव के 8 से 10 लोगों को नियमित रूप से रोजगार प्राप्त हो रहा है। उनका कहना है कि उनका मुख्य उद्देश्य न केवल स्वयं लाभ कमाना है, बल्कि अधिक से अधिक लोगों को इस काम से जोड़कर उन्हें भी आत्मनिर्भर बनाना है।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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