छत्तीसगढ़
8 घंटे पहले
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गन्ने की खेती पर बढ़ा बीमारी का संकट
छत्तीसगढ़ का बालोद जिला गन्ने की बड़े पैमाने पर खेती के लिए जाना जाता है, लेकिन फिलहाल यहां के किसान एक गंभीर चुनौती का सामना कर रहे हैं। वर्तमान में गन्ने की फसलों में रेड रॉट यानी लाल सड़न बीमारी का प्रकोप तेजी से फैलता हुआ नजर आ रहा है। यह बीमारी गन्ने की गुणवत्ता और पैदावार दोनों को काफी नुकसान पहुंचा सकती है। बालोद स्थित कृषि विज्ञान केंद्र के प्रमुख और वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ केआर साहू ने किसानों को सतर्क रहने और अपनी फसल की लगातार निगरानी करने का परामर्श दिया है।
कैसे पहचानें रेड रॉट के लक्षण
डॉ साहू के मुताबिक, रेड रॉट गन्ने की सबसे घातक बीमारियों में से एक है। इसकी पहचान करना मुश्किल नहीं है, बशर्ते किसान समय रहते खेत का नियमित मुआयना करें। इस बीमारी की शुरुआत में गन्ने के पौधों की पत्तियों के किनारों पर लाल रंग के निशान दिखाई देने लगते हैं। यदि इन शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज किया जाए, तो धीरे-धीरे संक्रमण पूरे पौधे में फैल जाता है और गन्ने के अंदर लाल सड़न पैदा होने लगती है। इससे न केवल फसल की चमक और गुणवत्ता खत्म हो जाती है, बल्कि कुल उत्पादन में भी भारी कमी आती है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि अगर बीमारी को शुरुआती स्तर पर ही भांप लिया जाए, तो इसे रोकना काफी आसान हो जाता है।
वैज्ञानिक द्वारा सुझाई गई दवाएं और समाधान
फसल को इस खतरनाक बीमारी से बचाने के लिए डॉ केआर साहू ने कुछ महत्वपूर्ण रासायनिक उपायों की जानकारी दी है। उन्होंने बताया कि किसान इन उपायों को अपनाकर अपनी फसल को सुरक्षित रख सकते हैं:
- टेबुकोनाजोल या एजोल का उपयोग: बीमारी के नियंत्रण के लिए टेबुकोनाजोल या एजोल का छिड़काव बेहद कारगर है। इसकी सही मात्रा एक मिलीलीटर दवा को एक लीटर पानी में मिलाकर तैयार की जानी चाहिए।
- कीट प्रबंधन: गन्ने की सुरक्षा के लिए थायोमेथोक्साम का छिड़काव भी किया जा सकता है। इसके लिए एक ग्राम थायोमेथोक्साम को एक लीटर पानी में घोलना चाहिए। इसके अतिरिक्त बिफेंथ्रिन का उपयोग करने की भी सलाह दी गई है।
हालांकि, डॉ साहू ने यह भी चेतावनी दी है कि किसी भी कीटनाशक या फफूंदनाशक का इस्तेमाल करते समय अत्यधिक सावधानी बरतना जरूरी है। किसानों को दवाओं की सही मात्रा, मिश्रण का अनुपात और उपयोग के तरीके के लिए हमेशा उत्पाद के लेबल पर दिए गए निर्देशों को पढ़ना चाहिए। बेहतर यही होगा कि किसी भी बड़े छिड़काव से पहले अपने स्थानीय कृषि विशेषज्ञ से परामर्श जरूर लें ताकि फसल को नुकसान न पहुंचे।
समय पर कार्रवाई ही बचाव है
वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ साहू का स्पष्ट मानना है कि खेत में बीमारी के लक्षण दिखते ही किसी भी प्रकार की देरी करना भारी पड़ सकता है। यदि समय पर नियंत्रण के उपाय नहीं अपनाए गए, तो यह संक्रमण एक पौधे से दूसरे पौधे तक बहुत तेजी से फैल सकता है। इसलिए किसानों को सलाह दी गई है कि वे अपनी फसलों की नियमित देखभाल करें और लक्षण दिखते ही फौरन उचित दवाओं का प्रयोग करें ताकि रेड रॉट के बढ़ते प्रभाव को रोका जा सके और संभावित आर्थिक नुकसान से बचा जा सके।
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