लालकृष्ण आडवाणी: वो नेता जिन्होंने जनसंघ का अध्यक्ष बनने से किया था इनकार, बाद में बदली देश की राजनीति राष्ट्रीय राजनीति 12 घंटे पहले 12
भारत रत्न लालकृष्ण आडवाणी का राजनीतिक सफर सिद्धांतों और संगठन क्षमता की मिसाल है। एक समय अध्यक्ष पद स्वीकार करने से हिचकिचाने वाले आडवाणी ने भाजपा को शून्य से शिखर तक पहुंचाया और कांग्रेस के वर्चस्व को चुनौती दी।

एक हिचकिचाता नेता जो बना युग पुरुष

भारतीय राजनीति के इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनका प्रभाव किसी एक राजनीतिक दल की सीमाओं में नहीं बंधता, बल्कि वे एक पूरे दौर की पहचान बन जाते हैं। लालकृष्ण आडवाणी ऐसे ही एक प्रभावशाली व्यक्तित्व हैं। जनसंघ की शुरुआती जड़ों से लेकर भारतीय जनता पार्टी को राष्ट्रीय पटल पर एक सशक्त विकल्प के रूप में स्थापित करने तक, आडवाणी का योगदान अतुलनीय रहा है। आज उन्हें भाजपा के कार्यकर्ताओं के लिए भीष्म पितामह के रूप में देखा जाता है, तो देश उन्हें एक ऐसे कुशल रणनीतिकार के रूप में जानता है, जिन्होंने भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी। हालांकि, उनके राजनीतिक जीवन का एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि वे कभी जनसंघ के अध्यक्ष बनने के इच्छुक नहीं थे।

विभाजन का दर्द और राजनीति में प्रवेश

8 नवंबर 1927 को सिंध प्रांत (जो अब पाकिस्तान में है) में जन्मे लालकृष्ण आडवाणी ने अपने जीवन के शुरुआती दिनों में ही विभाजन की त्रासदी को नजदीक से देखा। आजादी का जश्न मनाने के बजाय, उन्हें अपने घर से विस्थापित होना पड़ा। महज 14 साल की उम्र में ही उन्होंने अपना जीवन देश के नाम समर्पित करने का संकल्प ले लिया था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के माध्यम से वे राष्ट्र सेवा के मार्ग पर चले और बाद में सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया। विभाजन के दर्द और संघर्षों के बीच पनपा उनका देशभक्ति का जज्बा ही था, जिसने उन्हें बाद के वर्षों में एक दृढ़ राजनीतिक नेता के रूप में गढ़ा।

अध्यक्ष पद को लेकर झिझक

भाजपा के आधिकारिक अभिलेखों और ऐतिहासिक तथ्यों पर गौर करें तो पता चलता है कि दिसंबर 1972 में जब उन्हें जनसंघ की कमान संभालने के लिए कहा गया, तो वे बेहद संकोच में थे। उस समय अटल बिहारी वाजपेयी, जो फरवरी 1968 से पार्टी के अध्यक्ष थे, पद छोड़ना चाहते थे और चाहते थे कि कोई नया चेहरा जिम्मेदारी संभाले। अटल बिहारी वाजपेयी ने जब आडवाणी से इस बारे में बात की, तो आडवाणी ने साफ़ तौर पर इनकार कर दिया था। उनका मानना था कि वे एक अच्छे वक्ता नहीं हैं और सार्वजनिक सभाओं में उन्हें काफी घबराहट महसूस होती है। उन्हें लगता था कि वाजपेयी की वाकपटुता के सामने उनकी शैली कमजोर पड़ जाएगी। हालांकि, अटल बिहारी वाजपेयी के विशेष आग्रह और भरोसे के बाद उन्होंने अध्यक्ष पद स्वीकार किया।

संगठनात्मक क्षमता का चमत्कार

अध्यक्ष बनने के बाद आडवाणी ने अपनी कार्यशैली से यह साबित कर दिया कि एक नेता की पहचान सिर्फ भाषण देने से नहीं, बल्कि संगठन को मजबूत करने की क्षमता से होती है। 1980 से 1990 के बीच उन्होंने जिस प्रकार भाजपा को एक संगठित और राष्ट्रीय पार्टी के रूप में खड़ा किया, वह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय है। वर्ष 1984 के लोकसभा चुनावों में जब पार्टी मात्र 2 सीटों पर सिमट गई थी, तो कई लोगों को लगा कि पार्टी का भविष्य संकट में है। लेकिन आडवाणी की रणनीति ने अगले कुछ वर्षों में ही तस्वीर बदल दी। 1989 के चुनावों में पार्टी ने 86 सीटें जीतीं, जो एक बड़ी सफलता थी। इसके बाद 1992 में यह संख्या 121 और 1996 में 161 सीटों तक पहुंच गई। आजादी के बाद यह पहला मौका था जब कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई और भाजपा संसद में सबसे बड़े दल के रूप में उभरी।

राम रथयात्रा और वैचारिक विस्तार

आडवाणी की 1990 की ऐतिहासिक राम रथयात्रा ने उन्हें केवल एक नेता के रूप में नहीं, बल्कि एक जननायक के रूप में स्थापित किया। इस यात्रा ने पूरे देश में एक नई वैचारिक बहस छेड़ी और पार्टी को एक बड़ा जनाधार प्रदान किया। उस दौरान राजनीतिक हालात और वैचारिक संघर्ष के बीच आडवाणी ने भाजपा की विचारधारा को जन-जन तक पहुंचाया। वे अक्सर कहते थे कि प्रकृति हमें अवसर और परिणाम दोनों देती है, और हमें उनमें से चुनना होता है। उन्होंने अपनी प्रशासनिक दक्षता और आतंरिक सुरक्षा के प्रति अपनी कड़क नीतियों से भी देश की राजनीति पर गहरी छाप छोड़ी।

संसदीय परंपराओं के प्रति सम्मान

आडवाणी के भाषणों की खासियत यह थी कि वे हमेशा तथ्यपरक, तार्किक और राष्ट्रहित से ओत-प्रोत होते थे। वे उन चंद नेताओं में से थे, जिन्होंने विपक्ष में रहते हुए भी सत्ता पक्ष के साथ गरिमापूर्ण संबंध रखे। बतौर सांसद अपनी तीन दशक लंबी पारी में वे पहले गृह मंत्री बने और बाद में 1999 से 2004 के बीच अटल बिहारी वाजपेयी की कैबिनेट में उप प्रधानमंत्री के रूप में कार्यभार संभाला। उनके राजनीतिक लचीलेपन और सिद्धांतों के प्रति समर्पण के कारण ही उन्हें न केवल उनकी पार्टी, बल्कि विपक्षी दलों के नेता भी सम्मान की दृष्टि से देखते थे।

प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी से भारत रत्न तक

वर्ष 2009 के आम चुनावों के दौरान, 10 दिसंबर 2007 को भाजपा संसदीय बोर्ड ने आधिकारिक तौर पर लालकृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया था। हालांकि, उस चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन की जीत हुई। हार के बाद उन्होंने जिम्मेदारी का परिचय देते हुए 15वीं लोकसभा में सुषमा स्वराज को नेता प्रतिपक्ष की बड़ी जिम्मेदारी सौंपी। आडवाणी के योगदान को देखते हुए, उन्हें 2015 में देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से नवाजा गया। अंततः 9 साल बाद, 2024 में उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया, जो उनके दशकों लंबे राष्ट्र निर्माण के योगदान की परिणति थी।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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