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सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया की एफडी स्कीम और निवेश की अवधि
देश के प्रमुख सरकारी बैंकों में से एक सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया अपने ग्राहकों के लिए फिक्स्ड डिपॉजिट यानी एफडी के माध्यम से बचत का एक बेहतर अवसर प्रदान कर रहा है। बैंक की तरफ से निवेश के लिए न्यूनतम अवधि केवल 7 दिन तय की गई है, जबकि यदि कोई ग्राहक लंबी अवधि के लिए निवेश करना चाहता है, तो बैंक अधिकतम 10 साल तक के लिए एफडी खाता खोलने की सुविधा देता है। यदि आप भी सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में निवेश की योजना बना रहे हैं, तो विशेष रूप से 24 महीने की अवधि वाली एफडी पर मिलने वाले ब्याज को समझना जरूरी है।
24 महीने की एफडी पर मिलने वाला ब्याज
सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया द्वारा 24 महीने यानी 2 साल की अवधि वाली एफडी पर दी जा रही ब्याज दरें निवेश के वर्ग के हिसाब से निर्धारित की गई हैं। वर्तमान में बैंक इस अवधि पर 6.25 प्रतिशत से लेकर 6.75 प्रतिशत तक का सालाना ब्याज उपलब्ध करा रहा है। वे ग्राहक जिनकी उम्र 59 साल या उससे कम है, उन्हें इस अवधि के लिए 6.25 प्रतिशत का ब्याज मिलता है। वहीं, 60 साल या उससे अधिक आयु वाले वरिष्ठ नागरिक इस स्कीम के तहत 6.75 प्रतिशत ब्याज का लाभ उठा सकते हैं। ध्यान देने योग्य बात यह है कि ये दरें 3 करोड़ रुपये से कम की जमा राशि पर ही प्रभावी हैं।
वरिष्ठ नागरिकों के लिए विशेष सुविधाएं
अन्य सरकारी बैंकों की तरह, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया भी वरिष्ठ नागरिकों को सामान्य ग्राहकों की तुलना में अतिरिक्त लाभ देता है। वरिष्ठ नागरिकों को एफडी पर 0.50 प्रतिशत अधिक ब्याज दर का फायदा मिलता है। हालांकि, सुपर सीनियर सिटीजन, जिनकी आयु 80 साल या उससे अधिक है, उनके लिए बैंक द्वारा अतिरिक्त ब्याज का लाभ केवल नॉन-कॉलेबल खातों पर ही दिया जाता है। इस बैंक ने अपनी ब्याज दरों में अंतिम बार बदलाव 10 अगस्त, 2026 को किया था।
रेपो रेट और एफडी दरों का सीधा संबंध
भारतीय रिजर्व बैंक यानी RBI द्वारा तय किया गया रेपो रेट देश की बैंकिंग ब्याज दरों पर गहरा असर डालता है। हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक ने लगातार चौथी बार रेपो रेट को स्थिर बनाए रखने का निर्णय लिया है। इससे पहले दिसंबर 2025 में आरबीआई ने रेपो रेट में 0.25 प्रतिशत की कटौती करते हुए इसे 5.25 प्रतिशत किया था। सामान्य आर्थिक सिद्धांतों के अनुसार, जब रेपो रेट में कमी होती है तो लोन के साथ-साथ फिक्स्ड डिपॉजिट की दरें भी नीचे आती हैं। इसके विपरीत, रेपो रेट में वृद्धि होने पर बैंकों को कर्ज और जमा दोनों पर अपनी ब्याज दरें बढ़ानी पड़ती हैं।
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