बिहार
2 घंटे पहले
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लखीसराय के अशोक धाम मंदिर में दुखद हादसा
बिहार के लखीसराय स्थित ऐतिहासिक अशोक धाम मंदिर एक बार फिर से सुर्खियों में है। सावन के तीसरे सोमवार के पावन अवसर पर मंदिर परिसर में दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा था। इस दौरान अचानक मची भगदड़ ने बड़ा रूप ले लिया, जिसमें दुर्भाग्यवश 7 श्रद्धालुओं की मृत्यु हो गई। घटना की सूचना मिलते ही प्रशासन हरकत में आया और राहत कार्य शुरू किया गया। हादसे में 12 अन्य लोग घायल हुए हैं, जिन्हें तत्काल इलाज के लिए लखीसराय सदर अस्पताल में भर्ती कराया गया है। यह मंदिर न केवल अपनी धार्मिक मान्यताओं के लिए जाना जाता है, बल्कि हाल के वर्षों में यह वीआईपी हस्तियों के दौरे के कारण भी चर्चा में रहा है, जिसमें वर्ष 2023 में गृहमंत्री अमित शाह का यहां आकर शिव पूजा करना और मंदिर के संग्रहालय का निरीक्षण करना शामिल है। इस मंदिर को लोग 'बिहार का देवघर' भी कहते हैं।
8वीं शताब्दी से जुड़ा गौरवशाली इतिहास
अशोक धाम मंदिर का इतिहास काफी प्राचीन और गहरा है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यहां स्थित शिवलिंग की स्थापना 8वीं शताब्दी के आसपास हुई थी। पाल वंश के छठे सम्राट नारायण पाल ने इस कालखंड में शिवलिंग की नियमित पूजा और अर्चना की परंपरा शुरू करवाई थी। इसके बाद, 12वीं शताब्दी में राजा इंद्रद्युम्न ने यहां एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया। कहा जाता है कि लखीसराय की लाल पहाड़ी पर स्थित अपने राजमहल से मंदिर तक पहुंचने के लिए उन्होंने एक गुप्त सुरंग का निर्माण भी करवाया था। हालांकि, मुगल काल के दौरान आक्रमणों के कारण यह मंदिर ध्वस्त कर दिया गया और समय के साथ यह स्थान लुप्त हो गया।
चरवाहे अशोक और गिल्ली की रोचक कहानी
मंदिर के पुनरुद्धार की कहानी अत्यंत रोमांचक है। मुगल काल में नष्ट होने के बाद यह स्थान सदियों तक गुमनामी के अंधेरे में रहा। लेकिन 49 साल पहले, 7 अप्रैल 1977 को एक स्थानीय चरवाहे अशोक ने इस स्थान को फिर से दुनिया के सामने लाया। जिस दिन वह अपनी गायों को चरा रहा था, खेल-खेल में उसकी गिल्ली झाड़ियों के बीच चली गई। अपनी गिल्ली ढूंढते हुए जब उसने झाड़-झंखाड़ को साफ किया, तो वहां जमीन के नीचे दबा हुआ एक विशालकाय शिवलिंग नजर आया। उस चरवाहे के नाम पर ही इस जगह का नाम 'अशोक धाम' पड़ा।
पुनर्निर्माण और वर्तमान स्वरूप
शिवलिंग के मिलने के बाद स्थानीय लोगों की आस्था जागृत हुई और यहां एक भव्य मंदिर के निर्माण का संकल्प लिया गया। भक्तों के सहयोग से यह स्थान फिर से गुलजार हो गया। मंदिर के पुनर्निर्माण कार्य के बाद, 11 फरवरी 1993 को जगन्नाथपुरी के शंकराचार्य ने इसका औपचारिक उद्घाटन किया। आज यह स्थान बिहार ही नहीं, बल्कि संपूर्ण भारत के श्रद्धालुओं के लिए आस्था और विश्वास का प्रमुख केंद्र है। महाशिवरात्रि और सावन के महीने में यहां लाखों की संख्या में भक्त अपनी मनोकामनाएं लेकर आते हैं और जल अर्पित करते हैं।
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