पढ़ाई में पिछड़ रहे हैं बच्चे? एकल परिवारों का तनाव डाल रहा है गहरा असर जीवनशैली 4 घंटे पहले 3
संयुक्त परिवारों की कमी के कारण बच्चों के व्यवहार और उनकी सीखने की क्षमता पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है। मनोचिकित्सकों का मानना है कि केवल स्कूल की पढ़ाई बच्चे के संपूर्ण विकास के लिए काफी नहीं है।

एकल परिवारों का बच्चों के भविष्य पर प्रभाव

आजकल के दौर में एकल परिवारों का चलन तेजी से बढ़ा है, जिसके चलते बच्चों की जीवनशैली में कई बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं। पुराने समय में घर में दादा-दादी, चाचा-चाची और अन्य सदस्यों का साथ होता था, जो बच्चों के मानसिक और सामाजिक विकास में बड़ी भूमिका निभाते थे। आज की छोटी फैमिलीज में केवल माता-पिता और बच्चे ही साथ रह रहे हैं, जिससे बच्चों को वह सामाजिक परिवेश नहीं मिल पा रहा है।

व्यवहार और पढ़ाई पर असर

जौनपुर की जानी-मानी मनोवैज्ञानिक डॉ. साधना मौर्या का कहना है कि अगर आपका बच्चा पढ़ाई में कमजोर प्रदर्शन कर रहा है, तो इसे केवल उसकी मानसिक अक्षमता मान लेना गलत होगा। अक्सर माता-पिता बिना सोचे समझे बच्चे को दोषी ठहराने लगते हैं, जबकि इसके पीछे पारिवारिक परिवेश का बड़ा हाथ होता है। जब बच्चे परिवार और समाज के दूसरे लोगों से घुलते-मिलते नहीं हैं, तो उनके अनुभवों का दायरा काफी सिमट जाता है।

संपूर्ण विकास की जरूरत

विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों के बौद्धिक और भावनात्मक विकास के लिए केवल स्कूली किताबें या होमवर्क काफी नहीं है। घर का माहौल और बड़ों के साथ बिताया गया समय उनकी सीखने की क्षमता को बेहतर बनाता है। एकल परिवारों में बड़ों की कमी के कारण बच्चों में भावनात्मक विकास धीमा हो सकता है, जो सीधे तौर पर उनकी पढ़ाई पर नकारात्मक असर डालता है। इसलिए बच्चों के सामाजिक मेलजोल को बढ़ावा देना बहुत आवश्यक है।

चेतन तिवारी पाबना के उत्तर प्रदेश संवाददाता हैं और राज्य की राजनीति, प्रशासन तथा जमीनी मुद्दों को कवर करते हैं। लखनऊ में रहते हुए वे जिलों से लेकर विधानसभा तक की खबरें संतुलित रिपोर्टिंग के साथ पाठकों तक पहुंचाते हैं। आम लोगों के मुद्दों और स्थानीय घटनाओं पर उनका खास फोकस रहता है।

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