फेफड़ों के कैंसर का पता अब ट्यूमर बनने से 5.6 साल पहले! वैज्ञानिकों के नए ब्लड टेस्ट से बच सकती हैं लाखों जानें जीवनशैली 3 महीने पहले 55
वैज्ञानिकों ने खून में मौजूद '14-प्रोटीन सिग्नेचर' की खोज की है, जो फेफड़ों के कैंसर की चेतावनी उसके डायग्नोसिस से करीब 5.6 साल पहले दे सकता है। भारत जैसे देश के लिए, जहां 80-85% मामले आखिरी स्टेज में पकड़ में आते हैं, यह टेस्ट बड़ी राहत साबित हो सकता है।

कैंसर के खिलाफ चल रही लंबी लड़ाई में मेडिकल साइंस को एक बड़ी कामयाबी हाथ लगी है। वैज्ञानिकों ने इंसान के खून में एक ऐसा '14-प्रोटीन सिग्नेचर' खोज निकाला है, जो फेफड़ों के कैंसर का संकेत उसके आधिकारिक डायग्नोसिस से लगभग 5.6 साल पहले ही दे सकता है। भारत जैसे देश के लिए यह खोज किसी वरदान से कम नहीं, जहां इस बीमारी की पहचान अक्सर तब होती है जब इलाज बेहद कठिन हो चुका होता है।

एम्स दिल्ली के डॉक्टरों के अनुसार, यह नया रिस्क-असेसमेंट ब्लड टेस्ट समय रहते हाई-रिस्क लोगों की पहचान करने और इस तरह लाखों जिंदगियां बचाने की क्षमता रखता है।

भारत में देर से पकड़ में आती है बीमारी

भारत में फेफड़ों के कैंसर के लगभग 80-85% मामलों का पता आखिरी स्टेज में चलता है, जिसके चलते इलाज बेहद मुश्किल हो जाता है। देश में लंग कैंसर के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं, ऐसे में बीमारी की शुरुआती पहचान करने वाला कोई भी जरिया जीवन रक्षक साबित हो सकता है।

कैसे काम करता है यह नया फॉर्मूला?

प्रतिष्ठित जर्नल 'Cell' में प्रकाशित इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने उन्नत तकनीक का सहारा लिया। शोधकर्ताओं ने यूके बायोबैंक से जुड़े 48,000 से ज्यादा लोगों के ब्लड सैंपल्स और हेल्थ डेटा का गहराई से विश्लेषण किया।

इस अध्ययन में खून के भीतर ऐसे 14 प्रोटीन्स के कॉम्बिनेशन की पहचान हुई, जो कैंसर के पनपने से कई साल पहले ही शरीर में सक्रिय हो जाते हैं। जब इस प्रोटीन सिग्नेचर को व्यक्ति की उम्र, धूम्रपान के इतिहास और वायु प्रदूषण के जोखिम के साथ जोड़ा गया, तो इसने 5.6 साल पहले ही कैंसर के खतरे की सटीक चेतावनी दे दी।

भारत के लिए क्यों है यह गेम चेंजर?

रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में फेफड़ों के कैंसर के करीब 80-85% मामले आखिरी स्टेज में सामने आते हैं, जिससे मरीज को बचाना कठिन हो जाता है। खास बात यह है कि यह टेस्ट सिर्फ धूम्रपान करने वालों तक सीमित नहीं है।

हवा में फैले जहरीले प्रदूषण यानी पार्टिकुलेट मैटर की वजह से खतरे में जी रहे लोगों के जोखिम को भी यह टेस्ट आसानी से भांप सकता है, जो प्रदूषण से जूझ रहे भारतीय शहरों के लिए बेहद अहम है।

ट्यूमर डिटेक्शन नहीं, यह है रिस्क-असेसमेंट

एम्स दिल्ली के रेडिएशन ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. अभिषेक शंकर ने इस खोज को लेकर एक जरूरी स्पष्टीकरण भी दिया है। उन्होंने इसे रूटीन कैंसर जांच समझने से मना किया है।

"इस टेस्ट को कैंसर ढूंढने वाला रूटीन टेस्ट न समझें। यह शरीर में ट्यूमर नहीं ढूंढता, बल्कि यह एक रिस्क-असेसमेंट टूल है। यह उन 'हाई-रिस्क' लोगों की लिस्ट तैयार करेगा जिन्हें भविष्य में कैंसर हो सकता है। इसके बाद डॉक्टर उन लोगों की एडवांस स्क्रीनिंग और बचाव शुरू कर सकते हैं।"

प्रिया नायर पाबना की लाइफस्टाइल एवं फैशन एडिटर हैं, जो फैशन, ब्यूटी और लाइफस्टाइल ट्रेंड्स कवर करती हैं। रिश्तों, संस्कृति और रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े विषयों पर भी वे लिखती हैं। उनका लेखन आधुनिक और भारतीय जीवनशैली का संतुलन पेश करता है।

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