हरिद्वार में गंगनहर बंदी पर उठा विवाद, 108 साल पुराने समझौते को लेकर छिड़ी बहस उत्तराखंड 2 घंटे पहले 5
दशहरे के बाद शुरू हुई गंगनहर की वार्षिक बंदी के कारण हर की पैड़ी पर जलस्तर कम हो गया है, जिससे तीर्थयात्री परेशान हैं। गंगा सभा के पुरोहित ने इसे 1914-1916 के ऐतिहासिक समझौते का उल्लंघन बताया है।

गंगनहर की बंदी और श्रद्धालुओं की समस्या

हरिद्वार में दशहरे की रात से शुरू हुई गंगनहर की वार्षिक बंदी के बाद से शहर के प्रमुख घाटों पर पानी के स्तर में भारी कमी देखी जा रही है। हर की पैड़ी जैसे पवित्र स्थलों पर जल का प्रवाह कम होने से यहां आने वाले श्रद्धालुओं को धार्मिक अनुष्ठान करने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। पानी की कमी के चलते यहां पिंडदान, तर्पण और मुंडन जैसे जरूरी संस्कार संपन्न करना मुश्किल हो गया है।

ऐतिहासिक समझौते की दुहाई

गंगा सभा के वरिष्ठ पुरोहित पंडित कौशल सिखोला ने इस स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि यह मामला सीधे तौर पर एक सदी से भी पुराने समझौते से जुड़ा हुआ है। पंडित कौशल सिखोला के अनुसार, 1914 से 1916 के बीच पंडित मदन मोहन मालवीय के नेतृत्व में एक बड़ा आंदोलन चलाया गया था। इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य गंगा की अविरलता को बनाए रखना था।

समझौते का उल्लंघन

पुरोहित का दावा है कि उस समय ब्रिटिश सरकार के साथ एक आधिकारिक समझौता हुआ था। इस समझौते की मुख्य शर्त यह थी कि गंगनहर की वार्षिक बंदी के दौरान भी हर की पैड़ी पर हर हाल में कम से कम 2 फीट पानी बना रहेगा। पंडित सिखोला ने उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग पर इस पुराने और महत्वपूर्ण समझौते का उल्लंघन करने का सीधा आरोप लगाया है। उनका मानना है कि विभाग की लापरवाही के कारण श्रद्धालुओं की आस्था से खिलवाड़ हो रहा है और धार्मिक परंपराओं का पालन करना कठिन हो गया है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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