हरिद्वीर की हर की पौड़ी में गंगनहर की बंदी से सूखा जलप्रवाह, घाटों पर उभरा प्लास्टिक और फटे कपड़ों का अंबार उत्तराखंड एक घंटा पहले 5
हरिद्वार में गंगनहर की वार्षिक बंदी के कारण हर की पौड़ी पर गंगा का जलप्रवाह थम गया है। पानी हटने के बाद घाटों पर भारी मात्रा में पुराने कपड़े, जूते और प्लास्टिक कचरा दिखाई दे रहा है, जिससे 7 नवंबर तक श्रद्धालुओं को बिना स्नान किए लौटना पड़ रहा है।

धर्मनगरी हरिद्वार के सबसे प्रमुख धार्मिक केंद्र हर की पौड़ी पर इन दिनों एक बेहद चिंताजनक और चौंकाने वाला नजारा सामने आया है। मां गंगा की जिस कलकल बहती निर्मल धारा में डुबकी लगाने के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं, वहां इस समय जलप्रवाह पूरी तरह रुक गया है। पानी हटने के साथ ही घाटों के नीचे छिपी गंदगी और प्रदूषण का भयावह रूप उजागर हो गया है। जहां कल तक गंगा की पवित्र धारा बहती थी, वहां अब सूखी सतह पर पुराने कपड़ों के ढेर, फटे जूते-चप्पल, पॉलीथीन बैग और दुर्गंध मारता कचरा ही कचरा नजर आ रहा है।

कचरे के बीच सिक्कों की खोज और बिखरी गंदगी

गंगनहर में पानी का बहाव रुकते ही हर की पौड़ी के घाटों की स्थिति किसी डंपिंग यार्ड जैसी नजर आने लगी है। घाटों के किनारों और सुरक्षा के लिए लगाई गई लोहे की रेलिंगों पर श्रद्धालुओं द्वारा फेंके गए पुराने कपड़े टंगे हुए हैं। सूखी तलहटी और दलदल के बीच प्लास्टिक और जूतों का अंबार लगा है। इस कचरे और कीचड़ के बीच स्थानीय लोग तथा छोटे बच्चे सूखी सतह पर उतरकर श्रद्धालुओं द्वारा गंगा में अर्पित किए गए सिक्के, पैसे और धातु की अन्य वस्तुएं तलाशते दिखाई दे रहे हैं।

18 दिनों की वार्षिक बंदी और सफाई का काम

हर की पौड़ी पर जल न होने की मुख्य वजह गंगनहर की वार्षिक बंदी है। हर वर्ष नियमानुसार दशहरे से लेकर दिवाली तक कुल 18 दिनों के लिए गंगनहर में जलापूर्ति रोक दी जाती है। इस अवधि का उपयोग नहर की आवश्यक मरम्मत, तलहटी में जमा सिल्ट यानी गाद को हटाने और नियमित रखरखाव के लिए किया जाता है। प्रशासन के आधिकारिक बयानों के अनुसार, 7 नवंबर की मध्यरात्रि को गंगनहर में पुनः जलापूर्ति शुरू की जाएगी, जिसके बाद ही घाटों पर गंगा की धारा सामान्य हो सकेगी।

कुंभ 2027 की तैयारियां और जीर्णोद्धार कार्य

इस बार की गंगनहर बंदी केवल नियमित मरम्मत तक ही सीमित नहीं है। वर्ष 2027 में हरिद्वार में आयोजित होने वाले अर्धकुंभ और आगामी महाकुंभ के आयोजन को ध्यान में रखते हुए व्यापक स्तर पर बुनियादी ढांचे का काम शुरू किया गया है। कुंभ मेले के दौरान यहां जुटने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं के विशाल जनसमूह की सुरक्षा और सुविधा के लिए हर की पौड़ी तथा आसपास के अन्य घाटों की मजबूती, सीढ़ियों के पुनर्निर्माण और जीर्णोद्धार का काम युद्धस्तर पर किया जा रहा है।

श्रद्धालुओं में घोर निराशा, आचमन से चला रहे काम

इन दिनों हरिद्वार में बंगाल से आने वाले पर्यटकों और श्रद्धालुओं का विशेष यात्रा सीजन चल रहा है। दूर-दराज के क्षेत्रों से स्नान की मनोकामना लेकर पहुंचे श्रद्धालुओं को जब हर की पौड़ी पर सूखा नजारा मिलता है, तो उनकी उम्मीदों पर पानी फिर जाता है। जलप्रवाह बंद होने और 7 नवंबर तक स्नान पर लगी रोक के कारण श्रद्धालु केवल आचमन और गंगाजल का छिड़काव करके ही अपनी यात्रा पूरी करने को मजबूर हैं।

गंगा की पवित्रता और जलीय जीवों के सामने संकट

देशभर से आने वाले श्रद्धालु पाप मुक्ति और पुण्य लाभ की कामना के साथ गंगा नदी को मां का दर्जा देते हैं, लेकिन आस्था के नाम पर छोड़ी जाने वाली गंदगी नदी के अस्तित्व के लिए गंभीर खतरा बन चुकी है। जब तक पानी का प्रवाह तेज रहता है, तब तक यह सारा कचरा बहकर नजरों से ओझल रहता है, लेकिन जलस्तर घटते ही यह समस्या सतह पर आ जाती है। यह जमा कचरा और पॉलीथीन न केवल घाटों के सौंदर्य को नुकसान पहुंचा रहे हैं, बल्कि जलीय जीवों के जीवन के लिए भी बेहद खतरनाक साबित हो रहे हैं।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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