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एक घंटा पहले
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विचारों
बद्र समझौते से वैश्विक रक्षा राजनीति में नया मोड़
वैश्विक कूटनीति के पटल पर भारत की सुरक्षा प्राथमिकताओं और रक्षा निर्यात लक्ष्यों के सामने एक नया भू-राजनीतिक समीकरण उभरकर सामने आया है। कतर की राजधानी दोहा में पाकिस्तान, तुर्किये, कतर और इंडोनेशिया ने मिलकर एक नए 'बद्र समझौते' (Badr Memorandum of Understanding) पर हस्ताक्षर किए हैं। इस नए गठबंधन में इंडोनेशिया की मौजूदगी ने नई दिल्ली के रणनीतिक विश्लेषकों और रक्षा विशेषज्ञों के कान खड़े कर दिए हैं। यह समझौता ऐसे समय में हुआ है जब भारत दक्षिण-पूर्व एशिया में अपने रक्षा संबंधों को नई ऊंचाइयों पर ले जाने का प्रयास कर रहा है।
समझौते का स्वरूप और रणनीतिक निहितार्थ
21 अक्टूबर को संपन्न हुए इस समझौते के तहत चारों देशों ने सैन्य उत्पादन, तकनीकी प्रशिक्षण, रिसर्च और डेवलपमेंट के क्षेत्र में एक साथ मिलकर काम करने का संकल्प लिया है। इस पहल का मुख्य उद्देश्य अपनी रक्षा क्षमताओं को सुदृढ़ करना है। हालांकि, भारत के नजरिए से इस समझौते की सबसे चिंताजनक कड़ी इंडोनेशिया है। जुलाई 2026 में भारत ने इंडोनेशिया के साथ लगभग 630 मिलियन डॉलर का एक बड़ा रक्षा सौदा किया था। इस करार के अंतर्गत भारत को इंडोनेशिया को ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल और स्वदेशी अस्त्र एयर-टू-एयर मिसाइल की आपूर्ति करनी है। ब्रह्मोस मिसाइल के माध्यम से भारत न केवल अपनी सैन्य ताकत का प्रदर्शन कर रहा है, बल्कि दक्षिण-पूर्व एशिया में रक्षा निर्यात के एक बड़े केंद्र के रूप में भी खुद को स्थापित कर रहा है।
पाकिस्तान और तुर्की का प्रभाव
रक्षा जानकारों का मानना है कि इस समझौते में तुर्किये और पाकिस्तान का साथ आना भारत के लिए सतर्क रहने का संकेत है। तुर्किये के पास एक आधुनिक और मजबूत रक्षा उद्योग है, जबकि पाकिस्तान के साथ उसके सैन्य संबंध ऐतिहासिक रूप से बहुत गहरे रहे हैं। इन दोनों देशों का प्रभाव यदि इंडोनेशिया की रक्षा नीतियों पर पड़ता है, तो यह भारत के रणनीतिक हितों को प्रभावित कर सकता है। हालांकि, अभी तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार इस समझौते में भारत के खिलाफ किसी विशेष सैन्य कार्रवाई या भारत-इंडोनेशिया के बीच हुए मिसाइल सौदों को बाधित करने जैसा कोई प्रावधान स्पष्ट रूप से सामने नहीं आया है।
भारत के लिए चुनौती का दायरा
भारत के समक्ष अब चुनौती यह है कि वह इंडोनेशिया के साथ अपने रक्षा संबंधों को कैसे अक्षुण्ण रखे और दक्षिण-पूर्व एशिया में अपनी साझेदारी का विस्तार कैसे करे। फिलहाल 'बद्र समझौता' केवल रक्षा उद्योगों के बीच सहयोग बढ़ाने की एक कोशिश मात्र है। यह कोई सैन्य गठबंधन नहीं है जो किसी बाहरी हमले के समय एक-दूसरे की रक्षा करने के लिए बाध्य करता हो। इसलिए, इस समझौते का वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि ये चारों देश अपनी संयुक्त परियोजनाओं और तकनीकी साझाकरण को किस हद तक धरातल पर उतार पाते हैं।
मक्का पैक्ट के बाद दूसरी बड़ी पहल
इस्लामिक देशों के बीच यह दूसरा बड़ा रक्षा समझौता है। इससे पहले सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच 'मक्का पैक्ट' या 'मक्का संयुक्त रक्षा समझौता' हुआ था। तुर्किये के रक्षा मंत्रालय ने इस ताजा पहल पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि यह समझौता प्रत्येक देश की विशिष्ट सैन्य उत्पादन क्षमता का लाभ उठाने, एकीकरण को बढ़ावा देने और मित्र राष्ट्रों की रक्षा संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए किया गया है।
क्या ब्रह्मोस की तकनीक का खतरा है?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इंडोनेशिया के माध्यम से ब्रह्मोस की गोपनीय तकनीक पाकिस्तान या तुर्किये के हाथ लग सकती है? इस पर ब्रह्मोस एयरोस्पेस के पूर्व महानिदेशक, CEO और MD सुधीर कुमार मिश्रा ने स्पष्ट किया है कि सुरक्षा उपाय अत्यंत कड़े हैं। उन्होंने कहा, 'इंडोनेशिया के साथ हुआ रक्षा समझौता पर्याप्त सुरक्षा प्रोटोकॉल के साथ किया गया है। जकार्ता के साथ केवल ऑपरेशंस के लिए जरूरी यूजर मैनुअल साझा किए जाएंगे, किसी भी स्थिति में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर मैनुअल नहीं दिया जाएगा।' उन्होंने जोर दिया कि डेटा सुरक्षा, बौद्धिक संपदा और रक्षा संप्रभुता के सख्त नियम इन समझौतों का आधार हैं, इसलिए भारत की उन्नत तकनीक के प्रतिद्वंद्वियों तक पहुंचने की कोई संभावना नहीं है।
विशेषज्ञों की राय: सतर्कता जरूरी, घबराहट नहीं
सेंटर फॉर एयरोस्पेस पावर एंड स्ट्रेटेजिक स्टडीज के सीनियर फेलो और सेवानिवृत्त ग्रुप कैप्टन अजय अहलावत का मानना है कि भारत को स्थिति पर नजर रखनी चाहिए, लेकिन चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि एक समझौता ज्ञापन यानी MoU का मतलब सैन्य संधि नहीं होता। यह समझौता केवल काम के बंटवारे (Work-share) का एक ढांचा है। उन्होंने कहा, 'भारत को एक रक्षा महाशक्ति बनने के लिए अपने हथियारों का निर्यात उन देशों को करना होगा जिनकी सोच भारत से मिलती-जुलती है। ब्रह्मोस और अस्त्र मिसाइलों के रखरखाव और उनके जीवनकाल को बढ़ाने के लिए इंडोनेशिया को अंततः भारत (OEM) के सहयोग पर ही निर्भर रहना होगा, क्योंकि हथियार बेचने का मतलब तकनीक साझा करना नहीं होता।'
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