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एक घंटा पहले
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विधेयक की जांच के लिए बन सकती है जेपीसी
विदेशी अंशदान विनियमन कानून यानी FCRA में संशोधन के लिए लाए गए नए बिल को लेकर एक बड़ी खबर सामने आ रही है। सूत्रों के मुताबिक, केंद्र सरकार इस प्रस्तावित फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) अमेंडमेंट बिल, 2026 को एक संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेजने का मन बना रही है। इस कदम का मुख्य उद्देश्य इस विधेयक के प्रावधानों की बारीकी से जांच करना है, क्योंकि विपक्षी दलों की ओर से बिल की धाराओं को लेकर काफी आपत्तियां और चिंताएं जताई गई हैं।
विपक्ष की आपत्तियों के बीच सरकार का निर्णय
विपक्ष लगातार इस बिल के कुछ प्रावधानों पर सवाल उठा रहा है। हालांकि, अभी तक इसे लोकसभा के एजेंडे में विधिवत चर्चा और पारित होने के लिए शामिल नहीं किया गया था, लेकिन पहले मिली जानकारी के अनुसार इसे 12 अगस्त को सदन में पेश किए जाने के संकेत दिए गए थे। अब जेपीसी के पास भेजने की संभावनाओं के बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या प्रस्तावित समय-सीमा में कोई बदलाव किया जाता है या नहीं।
मिजोरम के मुख्यमंत्री और गृह मंत्री की मुलाकात
इस बिल को लेकर हाल ही में मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की थी। इस बैठक के बाद लालदुहोमा ने पत्रकारों से बातचीत में दावा किया था कि 7 अगस्त को हुई चर्चा के बाद उन्हें यह आश्वासन मिला है कि बिल पर 12 अगस्त को संसद में विचार किया जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया था कि गृह मंत्री ने उन्हें भरोसा दिया है कि कानून को पिछली तारीख से लागू नहीं किया जाएगा। गौरतलब है कि प्रस्तावित कानून को सबसे पहले 25 मार्च को लोकसभा में पेश किया गया था। अब जेपीसी वाली खबरों ने इस चर्चा को एक नया मोड़ दे दिया है।
बिल का मुख्य उद्देश्य क्या है?
इस प्रस्तावित कानून को लाने के पीछे सरकार का मुख्य लक्ष्य विदेशी फंडिंग हासिल करने वाले संगठनों और गैर-सरकारी संस्थाओं यानी एनजीओ पर कड़ी निगरानी रखना है। बिल के तहत एक विशेष अथॉरिटी बनाने का प्रस्ताव है, जिसे उन एनजीओ की संपत्ति पर नियंत्रण करने का अधिकार होगा जिनका FCRA लाइसेंस किसी कारणवश रद्द कर दिया गया है। यह कानून विदेशी योगदान के मैनेजमेंट और निपटान के लिए एक व्यापक ढांचा तैयार करने का प्रयास है। इस मामले पर भारतीय विदेश मंत्रालय ने भी कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया था कि FCRA बिल पूरी तरह से भारत का आंतरिक मामला है और इस पर अंतिम निर्णय केवल भारतीय संसद को ही लेना है।
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