गया के दो गांवों में पीने के पानी के लिए रोज चढ़ना पड़ता है 500 फीट ऊंचा पहाड़, टंकी ही सैकड़ों परिवारों का सहारा बिहार एक महीने पहले 28
बिहार के गया जिले के पहाड़पुर और काईचक गांव में भूजल खारा होने के कारण लोग पीने के पानी के लिए रोजाना करीब 500 फीट ऊंचे पहाड़ पर चढ़कर टंकी से पानी भरते हैं। सक्षम परिवार बंद जार का पानी खरीदकर काम चलाते हैं।

बिहार का गया जिला लंबे समय से सूखे और पानी की किल्लत से जूझता रहा है। गर्मी के मौसम में यह परेशानी कई इलाकों में और गहरी हो जाती है। जिला मुख्यालय से सिर्फ 2 किलोमीटर की दूरी पर बसे पहाड़पुर और काईचक गांव इसकी सबसे बड़ी मिसाल हैं, जहां के लोग आज भी एक-एक बूंद पीने के पानी के लिए संघर्ष करते दिखते हैं।

रोज 500 फीट की चढ़ाई और 30 मिनट का इंतजार

इन दोनों गांवों की महिलाएं, पुरुष और बच्चे हर दिन जार और बाल्टी लेकर करीब 500 फीट ऊंचे पहाड़ पर चढ़ते हैं और वहां बनी पानी टंकी से पानी भरकर लाते हैं। लगभग हर घर की दिनचर्या इसी टंकी पर टिकी हुई है। यहां हमेशा भीड़ लगी रहती है और लोगों को अपनी बारी के लिए करीब 30 मिनट तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है।

खारे भूजल ने बढ़ाई मुश्किल

ग्रामीणों के अनुसार गांव के चापाकल और मोटर पंप से खारा पानी निकलता है, जिसे खाने या पीने में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि लोग सुबह-शाम पहाड़ से पानी ढोने को मजबूर हैं या फिर पीने के लिए बंद जार वाला पानी खरीदते हैं।

घर के हर सदस्य की जिम्मेदारी

पानी लाना यहां किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि परिवार के हर सदस्य की जिम्मेदारी बन गई है। महिला हो, पुरुष हो या बच्चा, सभी इस काम में लगते हैं। जो लोग खरीदकर पानी नहीं पी सकते, उनके सामने पहाड़ चढ़ने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता।

भीषण गर्मी में महिलाएं और बच्चे बड़ी-बड़ी बाल्टी, तसला और जार में पानी भरकर पहाड़ से नीचे उतरते हैं। सिर पर पानी लेकर उतरते समय कई बार महिलाएं फिसलकर गिर जाती हैं और घायल भी हो जाती हैं, फिर भी मजबूरी में यह सिलसिला रोज दोहराया जाता है।

नल-जल योजना सिर्फ नहाने-धोने के काम

गांव में नल-जल योजना की सुविधा भी मौजूद है, मगर इससे आने वाला पानी खारा होने के कारण खाने-पीने में काम नहीं आता। लोग इसका इस्तेमाल केवल नहाने और कपड़े धोने के लिए करते हैं। ग्रामीण बताते हैं कि जिस दिन पहाड़ से पानी नहीं आ पाता, उस दिन खाने-पीने में मुश्किल खड़ी हो जाती है, इसलिए वे बाकी सारे काम छोड़कर सबसे पहले पानी लाने ही जाते हैं।

दूसरी ओर, जो परिवार आर्थिक रूप से सक्षम हैं, वे पीने का पानी खरीदते हैं और इस पर हर महीने सैकड़ों रुपये खर्च करते हैं।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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