बिहार
एक महीने पहले
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विचारों
गया की पत्रकारिता के आधार स्तंभ
बिहार के गया शहर में फोटो पत्रकारिता की नींव रखने वाले श्याम भंडारी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। चाणक्यपुरी कॉलोनी निवासी 74 वर्षीय श्याम भंडारी ने लगभग 50 वर्षों तक पत्रकारिता जगत में अपनी सक्रिय भूमिका निभाई है। आज वे भले ही इस भागदौड़ भरी जिंदगी से दूर अपने परिवार के साथ समय बिता रहे हैं, लेकिन उनका पांच दशक लंबा करियर संघर्ष और समर्पण की मिसाल है। उनकी पत्रकारिता का सफर किसी नियोजित योजना का हिस्सा नहीं था, बल्कि यह 1974 के ऐतिहासिक छात्र आंदोलन की देन है।
स्टूडियो से शुरुआत और छात्र आंदोलन का मोड़
पत्रकारिता में आने से पहले श्याम भंडारी गया में अपना एक स्टूडियो चलाते थे। उस दौर में शहर में बहुत कम स्टूडियो हुआ करते थे, और उनका काम काफी व्यवस्थित था। वे लोगों की तस्वीरें खींचते थे और रील की सफाई यानी प्रोसेसिंग के बाद प्रिंट उपलब्ध कराते थे। उस समय तक उनका ध्यान केवल अपने काम पर था। लेकिन तभी बिहार में छात्र आंदोलन की लहर उठी, जिसकी शुरुआत गया जिले से मानी जाती है। उस दौरान पूरे शहर में आंदोलन का शोर था और श्याम भंडारी ने अपनी जिज्ञासावश इस आंदोलन की कई तस्वीरें अपने कैमरे में कैद कर लीं। उस वक्त उन्हें यह अंदाजा भी नहीं था कि ये तस्वीरें उनकी जिंदगी का रास्ता बदल देंगी।
अखबारों तक कैसे पहुंची तस्वीरें
अपनी खींची हुई तस्वीरों को उन्होंने अपने एक दोस्त के माध्यम से अखबार के संपादक तक पहुंचाया, जो उस दोस्त के मामा थे। यह प्रयास सफल रहा और उनकी तस्वीरें न केवल उस अखबार में छपीं, बल्कि देश के कई अन्य राज्यों के समाचार पत्रों में भी प्रकाशित हुईं। इस घटना ने श्याम भंडारी को नई पहचान दी। इसके बाद वे धीरे-धीरे राज्य और देश की कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं और अखबारों से जुड़ते गए। वर्ष 1980 के बाद से उन्होंने पत्रकारिता को ही अपना पूर्णकालिक पेशा बना लिया। उस दौर में वे गया शहर के इकलौते फोटो जर्नलिस्ट थे।
चुनौतियों भरा सफर और नक्सल प्रभावित इलाका
उन दिनों फोटो पत्रकारिता करना आज की तरह आसान नहीं था। न तो आधुनिक डिजिटल कैमरे थे और न ही तकनीक की कोई विशेष सुविधा। इसके बावजूद उन्होंने अपने काम में कोई कमी नहीं आने दी। श्याम भंडारी के करियर का एक बड़ा हिस्सा नक्सल प्रभावित इलाकों में गुजरा। उन क्षेत्रों में जाना और फोटो खींचना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं था, जिसे उन्होंने बखूबी निभाया। वे अक्सर नक्सलियों और पुलिस या ग्रामीणों के बीच हुई मुठभेड़ों की तस्वीरें जोखिम उठाकर खींचा करते थे।
छापेमारी और जान बचाने का किस्सा
श्याम भंडारी याद करते हैं कि जब 1974 के छात्र आंदोलन की तस्वीरें अखबारों में छपीं, तो प्रशासन का ध्यान उन पर गया और उनके स्टूडियो पर छापेमारी की गई। हालांकि, उन्होंने चतुराई दिखाते हुए कैमरा पहले ही सुरक्षित स्थान पर छिपा दिया था, जिससे वे मुश्किल से बच पाए। नक्सल दौर की यादें साझा करते हुए उन्होंने बताया कि उस समय गया में स्थिति इतनी खराब थी कि अक्सर स्कूल उड़ाने या रेलवे लाइन को नुकसान पहुंचाने जैसी घटनाएं होती थीं। कई बार तो उन्हें रात के 2 बजे ही घटनास्थल के लिए निकलना पड़ता था। एक बार का वाकया सुनाते हुए उन्होंने बताया कि जब वे गोलीबारी के दौरान फोटो खींच रहे थे, तब एक नक्सली ने ही उन्हें सुरक्षित स्थान पर निकालकर उनकी जान बचाई थी। श्याम भंडारी ने अपनी तस्वीरों के माध्यम से कई जरूरतमंदों को न्याय दिलाने की कोशिश भी की है।
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