जीवित नवजात को रिकॉर्ड में बता दिया मृत: जन्म प्रमाण पत्र की जगह थमा दिया मृत्यु प्रमाण पत्र, सुधार के लिए महीनों से भटक रहा पिता उत्तर प्रदेश 2 घंटे पहले 1
कानपुर के नरवल तहसील क्षेत्र में एक पिता अपने नवजात बेटे का जन्म प्रमाण पत्र बनवाने पहुंचा, मगर विभाग ने बच्चे का मृत्यु प्रमाण पत्र जारी कर दिया। जीवित बेटे को सरकारी कागजों में जिंदा साबित करने के लिए परिवार कई महीनों से दफ्तरों के चक्कर काट रहा है।

कानपुर: जैसे-जैसे कामकाज डिजिटल होता जा रहा है, विभागों के सॉफ्टवेयर भी लगातार अपडेट हो रहे हैं। लेकिन यही अपडेटेड व्यवस्था कब किसी जीवित इंसान को कागजों में मृत घोषित कर दे, इसका हैरान कर देने वाला उदाहरण कानपुर के नरवल तहसील क्षेत्र में सामने आया है। यहां एक पिता अपने नवजात बेटे का जन्म प्रमाण पत्र बनवाने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटता रहा, पर जब दस्तावेज हाथ में आया तो उसमें बेटे को मृत बता दिया गया था। हालत यह है कि पिता कई महीनों से अपने जीवित बेटे को सरकारी रिकॉर्ड में जिंदा साबित करने के लिए अधिकारियों से गुहार लगा रहा है, पर उसे केवल आश्वासन ही मिल रहे हैं।

क्या है पूरा मामला

यह मामला नरवल तहसील के सरसौल विकासखंड के अंतर्गत आने वाले बांबी गांव का है। गांव के निवासी जितेंद्र कुमार, पुत्र जगलाल, के मुताबिक उनके बेटे अयांश का जन्म 9 जनवरी 2026 को घर पर हुआ था। बच्चे के जन्म के बाद उन्होंने नियमानुसार जन्म प्रमाण पत्र के लिए आवेदन किया था, ताकि आगे चलकर स्कूल में दाखिले, सरकारी योजनाओं और दूसरे जरूरी दस्तावेजों में किसी तरह की दिक्कत न हो।

लेकिन आवेदन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद जब दस्तावेज मिला तो उसे देखकर पूरे परिवार के होश उड़ गए। जन्म प्रमाण पत्र के बजाय 24 फरवरी 2026 को बच्चे का मृत्यु प्रमाण पत्र जारी कर दिया गया था। कागज में बच्चे को मृत दिखाया गया, जबकि वह पूरी तरह स्वस्थ है और अपने परिवार के साथ रह रहा है।

महीनों से दफ्तरों के चक्कर

पीड़ित पिता का आरोप है कि इस गंभीर गलती को सुधरवाने के लिए वह कई महीनों से ब्लॉक और तहसील कार्यालय के चक्कर लगा रहे हैं। उन्होंने कई बार अधिकारियों और कर्मचारियों को पूरे प्रकरण की जानकारी दी, मगर अब तक न तो इस त्रुटि का स्थायी समाधान हुआ और न ही सही जन्म प्रमाण पत्र जारी किया गया। इसके चलते परिवार मानसिक तनाव और परेशानी से जूझ रहा है।

जितेंद्र कुमार का कहना है कि सरकारी रिकॉर्ड में उनका बेटा मृत दर्ज हो चुका है, जबकि असल में वह जीवित है। ऐसी स्थिति में आगे बच्चे को सरकारी दस्तावेज बनवाने, पढ़ाई-लिखाई और दूसरी सुविधाओं का लाभ लेने में बड़ी अड़चनें आ सकती हैं।

पंचायत सचिव ने क्या कहा

वहीं इस मामले पर बांबी ग्राम पंचायत के सचिव जुबैर अहमद ने कहा कि उन्हें इस प्रकरण की पहले से कोई जानकारी नहीं थी। उन्होंने बताया कि जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्र के लिए ऑनलाइन आवेदन में अलग-अलग विकल्प होते हैं। हो सकता है कि आवेदन भरते वक्त किसी कैफे या जनसेवा केंद्र पर गलती से मृत्यु प्रमाण पत्र वाला विकल्प चुन लिया गया हो।

सचिव के अनुसार यह प्रमाण पत्र उनके कार्यकाल से पहले तैनात रहे पंचायत सचिव के समय जारी हुआ था। उन्होंने बताया कि अब इस मृत्यु प्रमाण पत्र को निरस्त कर दिया गया है और पीड़ित को नए सिरे से ऑनलाइन आवेदन करने की सलाह दी गई है।

व्यवस्था पर उठते सवाल

इसके बावजूद बड़ा सवाल यह है कि आखिर एक जीवित बच्चे को सरकारी रिकॉर्ड में मृत कैसे दर्ज कर दिया गया और इस भूल को सुधारने में महीनों का वक्त क्यों लग गया। यह प्रकरण सरकारी कार्यप्रणाली और ऑनलाइन प्रमाण पत्र व्यवस्था की खामियों को भी उजागर करता है। फिलहाल पीड़ित परिवार को उम्मीद है कि जल्द ही उनके बेटे का सही जन्म प्रमाण पत्र जारी होगा और उन्हें अपने ही बेटे के जिंदा होने का सबूत देने के लिए दफ्तरों के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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