कच्चे केले का पौष्टिक आटा: सेहत का खजाना और मुनाफे का जरिया, ₹250 प्रति किलो है बाजार भाव बिहार एक घंटा पहले 2
पूर्वी चंपारण के एक किसान ने कच्चे केले से आटा बनाकर एक नई मिसाल कायम की है। यह आटा फलाहार के लिए बेहतरीन है और बाजार में ₹250 प्रति किलो की कीमत पर बिक रहा है।

केले का आटा: सेहत और स्वाद का अनूठा संगम

केला केवल एक सामान्य फल नहीं है, बल्कि यह पोषण का एक बड़ा स्रोत माना जाता है। अमूमन लोग इसे सीधे फल के रूप में खाते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि कच्चे केले से बना आटा आजकल काफी चर्चा में है? बिहार के पूर्वी चंपारण जिले के मोतिहारी में रहने वाले सोहन कुमार ने इस दिशा में एक सफल प्रयोग किया है। वे पिछले दो सालों से कच्चे केले से आटा तैयार कर रहे हैं और इसके जरिए न केवल लोगों को स्वस्थ विकल्प दे रहे हैं, बल्कि खुद भी अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। सोहन कुमार की खासियत यह है कि वे अपनी खेती से निकले केलों का ही उपयोग करके इस विशेष आटे का उत्पादन करते हैं।

पोषक तत्वों से भरपूर है यह आटा

सोहन कुमार के अनुसार, कच्चे केले का आटा विटामिन्स और मिनरल्स का भंडार है। यह शरीर में पोषक तत्वों की कमी को तेजी से दूर करने में सहायक होता है। स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोगों और उन लोगों के लिए, जो अपने आहार में प्राकृतिक तत्वों को शामिल करना चाहते हैं, यह आटा एक वरदान से कम नहीं है। इसकी बढ़ती लोकप्रियता के पीछे का बड़ा कारण इसका फलाहारी होना है, जिसके चलते लोग इसे व्रत और त्यौहारों के दौरान भी आसानी से उपयोग कर सकते हैं।

घर पर कैसे तैयार करें केले का आटा

सोहन कुमार ने केले का आटा बनाने की प्रक्रिया को काफी सरल बताया है, जिसे कोई भी अपने घर पर अपना सकता है। इसकी चरणबद्ध विधि इस प्रकार है:

  • कटाई: सबसे पहले बागान से तोड़े गए कच्चे केलों को धोकर अच्छी तरह साफ कर लिया जाता है। इसके बाद इन्हें चिप्स की तरह बारीक स्लाइस में काटा जाता है।
  • सुखाना: कटे हुए इन चिप्स को कड़क धूप में 2 से 3 दिनों तक अच्छी तरह सुखाया जाता है, ताकि इसमें नमी बिल्कुल न रहे।
  • पिसाई: जब चिप्स पूरी तरह से सूखकर कुरकुरे हो जाते हैं, तो उन्हें आटा चक्की या मिल में ले जाकर बारीक पीस लिया जाता है। इस प्रक्रिया से शुद्ध और पौष्टिक केले का आटा तैयार हो जाता है।

बाजार में मांग और उपयोग

वर्तमान में स्थानीय बाजार में यह विशेष आटा ₹250 प्रति किलो की दर से बिक रहा है। चूंकि यह पूरी तरह शुद्ध और फलाहारी होता है, इसलिए धार्मिक आयोजनों और उपवास के दौरान इसकी मांग काफी बढ़ जाती है। इस आटे का उपयोग करके रोटियां, हलवा और पुआ जैसे स्वादिष्ट व्यंजन भी बनाए जा सकते हैं। सोहन कुमार का यह नवाचार बिहार के अन्य किसानों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन रहा है, जो अपनी फसलों से अतिरिक्त कमाई करने के नए तरीके तलाश रहे हैं। यह प्रयोग दर्शाता है कि कैसे पारंपरिक खेती में तकनीक और नवाचार का तड़का लगाकर बड़े बदलाव लाए जा सकते हैं।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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