बिहार
एक घंटा पहले
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विचारों
बिहार के मधुबनी जिले के बेनीपट्टी के रहने वाले किसान आनंद चंद्र ठाकुर का खेती-किसानी का सफर बेहद प्रेरक रहा है। करीब 72 वर्ष की उम्र वाले आनंद बीते 50 वर्षों से कृषि के क्षेत्र में सक्रिय हैं। उन्होंने हाईटेक फार्मिंग में लंबे समय तक काम किया और 45 वर्षों तक वर्मी एवं उससे जुड़ी कंपोस्ट पर पूसा, हैदराबाद समेत विभिन्न संस्थानों के वैज्ञानिकों के साथ मिलकर शोध किया। वे दावा करते हैं कि उनकी और उनकी टीम की सोच के आधार पर ही आज पूरा भारत हाईटेक खेती में नए प्रयोग कर पा रहा है, और इसकी शुरुआत उन्होंने ही की थी।
पढ़े-लिखे अनुभवी किसान का जुनून
हर व्यक्ति को कोई न कोई क्षेत्र पसंद आता है, जिसमें वह काम करना चाहता है। मधुबनी के इस 72 वर्षीय किसान ने खेती को ही अपना जुनून बना लिया। आनंद बताते हैं कि कृषि का क्षेत्र हमेशा से उनके जीवन का हिस्सा रहा, क्योंकि उनके पिता किसान थे और उनकी परवरिश उसी माहौल में हुई।
उनके पास खुद का 50 वर्षों का अनुभव है, जिसमें एक ही पेड़ पर कई किस्म के आम उगाना, केले की बागवानी, एक पेड़ का तना और दूसरे पेड़ की कलम जोड़ने जैसी तकनीक तथा मशरूम की खेती शामिल है।
वैज्ञानिकों के साथ कंपोस्ट पर शोध
आज से करीब 35 से 40 वर्ष पहले उन्होंने दुनिया भर के किसानों और कृषि वैज्ञानिकों के साथ वर्मी कंपोस्ट पर काम किया और सलाह-मशविरा किया। उस दौर में लोग वेस्ट मटेरियल को फेंक दिया करते थे, लेकिन उसका सही उपयोग कैसे किया जाए और उसे एक स्थान से दूसरे स्थान तक कैसे पहुंचाया जाए, इस पर उन्होंने काम किया। हैदराबाद के उस संस्थान में, जहां दुनिया भर के विद्यार्थी कृषि में पीजी करते हैं, उन्होंने डॉ. गोयल की टीम के साथ मिलकर वर्मी कंपोस्ट को हाईटेक खेती में इस्तेमाल करने पर काम किया।
मशरूम उत्पादन और मौसम की चुनौती
जब लोग हाईटेक फार्मिंग के बारे में जानते तक नहीं थे, तब से वे मधुबनी जिले में मशरूम का उत्पादन कर रहे हैं। पुराने दिनों को याद करते हुए आनंद चंद्र ठाकुर उर्फ भोला ठाकुर बताते हैं कि साल 2001 में वे पूसा से बीज लेकर आए थे। उस समय सड़कें तक नहीं थीं, ऐसे में मुलायम बीजों को धूल और धूप से बचाते हुए वे घर ले आए, मशरूम उगाया और इसे जिला अधिकारी तथा कृषि विभाग को दिखाया।
आज किसान हाईटेक खेती में किसी भी मौसम में आसानी से वर्म उपलब्ध कर लेता है, लेकिन पहले गर्मी में वर्मी कंपोस्ट सड़ने-गलने लगता था। इसी समस्या के समाधान के लिए उन्होंने पूसा, हैदराबाद और लद्दाख आदि के किसानों एवं वैज्ञानिकों के साथ मिलकर काम किया। इसके बाद उन्होंने ऐसी अवधारणा दुनिया को दी, जिससे वर्म खराब न हो और हर मौसम में उसका इस्तेमाल किया जा सके।
आज भी सक्रिय और फिट
उम्र के इस पड़ाव पर भी वे पूरी तरह फिट हैं और खेतों से लेकर घर तक तमाम कामों में जुटे रहते हैं। कभी-कभार वे बाहर जाकर प्रशिक्षण भी देते हैं।
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