भोले बाबा से लगाई गुहार: स्कूल फीस भरने के पैसे नहीं थे, तो 3 बेटियों ने कंधे पर उठाई कांवड़ हरियाणा एक घंटा पहले 4
फरीदाबाद की 15 साल की छात्रा साधना ने अपने दिव्यांग माता-पिता और आर्थिक तंगी के चलते कांवड़ यात्रा शुरू की है। पढ़ाई जारी रखने के लिए उसने महादेव से चमत्कार की उम्मीद की है।

आस्था और संघर्ष की मिसाल

जीवन की कठिन परिस्थितियां कई बार इंसान के धैर्य की परीक्षा लेती हैं। फरीदाबाद से एक ऐसी ही भावुक कर देने वाली कहानी सामने आई है, जहां महज 15 साल की एक बेटी ने गरीबी और स्कूल की फीस न भर पाने की लाचारी के बीच हिम्मत नहीं हारी। इस बेटी ने महादेव पर अटूट विश्वास जताते हुए हरिद्वार से कांवड़ यात्रा शुरू की है। साधना नाम की इस छात्रा का मानना है कि यदि मन में सच्ची लगन हो, तो भोले बाबा उसकी पुकार जरूर सुनेंगे। वह अपने दिव्यांग माता-पिता के सिर से कर्ज का बोझ उतारने और अपनी पढ़ाई पूरी करने की मन्नत लेकर घर से निकली है।

फीस की चिंता और भोले बाबा का सहारा

साधना ने अपनी आपबीती साझा करते हुए बताया कि वह 11वीं कक्षा की छात्रा है। उसने 27 जुलाई को हरिद्वार से अपनी पहली कांवड़ यात्रा का संकल्प लिया। उसने कहा कि उसके पिता बेहद गरीब हैं और परिवार पर काफी कर्ज हो गया है। आर्थिक तंगी के कारण स्कूल की फीस जमा करना तक मुश्किल हो गया है। साधना ने कहा, मैंने भोले बाबा से बस यही प्रार्थना की है कि वे हमारे परिवार की परेशानियां दूर करें। मैं अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहती हूं और मुझे विश्वास है कि महादेव हमारी मदद जरूर करेंगे। उसके साथ उसके छोटे भाई और छोटी बहन भी कांवड़ उठाकर पूरी श्रद्धा के साथ इस लंबी पदयात्रा में शामिल हैं।

दिव्यांग माता-पिता और बेटियों का संकल्प

साधना मूल रूप से उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के कोसीकलां की रहने वाली है। उसके परिवार में माता-पिता दोनों ही दिव्यांग हैं। पिता सिलाई का काम करते हैं और मां घर संभालती हैं। परिवार में कुल चार भाई-बहन हैं, जिनमें साधना सबसे बड़ी है। साधना बताती है कि यह उसके और उसके पिता के जीवन की पहली कांवड़ यात्रा है। फरीदाबाद के रास्ते में उसे लोगों का भरपूर प्यार और सहयोग मिला है। श्रद्धालुओं ने हर कदम पर उनकी मदद की, जिससे इस नन्ही कांवड़िये का हौसला और भी बढ़ गया है।

पिता का दर्द और उम्मीद

साधना के पिता भरत सिंह भी अपनी बेटियों के साथ कांवड़ लेकर चल रहे हैं। उनका कहना है कि सिलाई की कमाई इतनी नहीं है कि घर के खर्च के साथ बच्चों की फीस समय पर भरी जा सके। घर बनाने के लिए लिया गया कर्ज अब एक बड़ा बोझ बन चुका है, जिसकी किस्तें चुकाना भी मुश्किल हो रहा है। भरत सिंह कहते हैं कि उनकी आर्थिक स्थिति बहुत खराब है, लेकिन ईश्वर पर उनका भरोसा आज भी अटूट है। वे अपनी बेटी के सपनों को मरते हुए नहीं देख सकते, इसलिए इस कठिन यात्रा पर निकल पड़े हैं। उन्हें पूरा यकीन है कि महादेव उनकी इस मेहनत और आस्था को व्यर्थ नहीं जाने देंगे और जल्द ही उनके जीवन में सुखद बदलाव लाएंगे।

प्रेरणा बनी यह कहानी

साधना और उसके परिवार का यह जज्बा समाज के लिए एक बड़ी सीख है। यह परिवार दिखाता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी हार नहीं माननी चाहिए। एक तरफ जहां तमाम सुविधाएं होने के बावजूद लोग छोटी मुश्किलों से घबरा जाते हैं, वहीं यह बेटी अपनी पढ़ाई को लेकर इतनी गंभीर है कि उसने महादेव से मदद मांगने के लिए पैदल कांवड़ यात्रा का कठिन मार्ग चुना। उनकी यह यात्रा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह उस मासूम उम्मीद का भी आईना है जिसे गरीबी भी नहीं कुचल पाई है। अब हर कोई यही कामना कर रहा है कि इस परिवार की मुराद पूरी हो और साधना का शिक्षा के प्रति यह जुनून सफल हो।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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