कुंभ के बजट का 0.1% मिल जाता तो बच जाते 100-125 स्कूल, सुप्रीम कोर्ट जज ने उठाए तीखे सवाल राष्ट्रीय राजनीति 5 घंटे पहले 2
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले ने महाराष्ट्र के सरकारी स्कूलों की बदहाली पर गहरी नाराजगी जताई है। उन्होंने नासिक कुंभ और अन्य बड़े प्रोजेक्ट्स पर होने वाले भारी खर्च की तुलना शिक्षा बजट से करते हुए कहा कि बुनियादी सुविधाओं के अभाव में स्कूलों का बंद होना दुर्भाग्यपूर्ण है।

शिक्षा और बड़े बजट के बीच का विरोधाभास

महाराष्ट्र में सरकारी स्कूलों के गिरते स्तर और उनके बंद होने की बढ़ती संख्या पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले ने गंभीर चिंता व्यक्त की है। धुले जिले में एक हाईस्कूल के भीतर स्मार्ट क्लासरूम के लोकार्पण समारोह में भाग लेते हुए उन्होंने सरकारी प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े किए। उनका तर्क था कि बड़े धार्मिक आयोजन और भव्य इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर पानी की तरह पैसा बहाने वाली व्यवस्था यदि सरकारी स्कूलों की मामूली जरूरतों पर ध्यान दे, तो शिक्षा का चेहरा बदला जा सकता है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि यदि नासिक कुंभ के लिए निर्धारित बजट का केवल 0.1 फीसदी हिस्सा भी मराठी माध्यम के सरकारी स्कूलों के लिए आवंटित कर दिया जाता, तो लगभग 100 से 125 स्कूलों को बंद होने के कगार से बचाया जा सकता था।

भारी भरकम खर्च बनाम स्कूल की बुनियादी जरूरतें

जस्टिस वराले ने आंकड़ों के साथ अपनी बात रखी। उन्होंने उल्लेख किया कि नासिक कुंभ के लिए आवंटित बजट का अनुमान लगभग 32 से 34 हजार करोड़ रुपये के आसपास है। इसके अतिरिक्त, विभिन्न गलियारा यानी कॉरिडोर परियोजनाओं पर भी राज्य सरकार 11 हजार करोड़ रुपये तक खर्च कर रही है। इन बड़े खर्चों के मुकाबले स्कूलों को बचाने की लागत बेहद मामूली है। उन्होंने गणना करते हुए बताया कि यदि कुंभ के कुल बजट का 0.1 प्रतिशत हिस्सा, जो कि लगभग 32 करोड़ रुपये के बराबर है, अगर स्कूलों में बुनियादी ढांचे के विकास और रखरखाव पर खर्च किया जाए, तो सैकड़ों स्कूलों को ताला लगने से रोका जा सकता था। उनके अनुसार, बच्चों का भविष्य और उनकी शिक्षा किसी भी आयोजन या निर्माण कार्य से अधिक महत्वपूर्ण होनी चाहिए।

अपनी जड़ों और मराठी शिक्षा पर विचार

जस्टिस वराले ने अपने व्यक्तिगत अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि उन्होंने कक्षा 10 तक की पढ़ाई नगर निगम और जिला परिषद के स्कूलों में मराठी माध्यम से पूरी की है। उन्होंने जोर देकर कहा कि मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा में शिक्षा प्राप्त करना किसी की प्रगति में बाधा नहीं बनता, बल्कि यह सोचने के दायरे को और विस्तृत करता है। उन्होंने अपने करियर का हवाला देते हुए बताया कि मराठी माध्यम से पढ़े होने के बावजूद उन्हें अपने पेशेवर जीवन में कोई मुश्किल नहीं आई। बाद में एक साक्षात्कार के दौरान उन्होंने दोहराया कि शिक्षा के प्रति उनकी चिंता पूरी तरह से उनके व्यक्तिगत अनुभवों और मानवीय संवेदनाओं से उपजी है। उन्होंने स्वास्थ्य और प्राथमिक शिक्षा को प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार करार दिया है।

ग्रामीण स्कूलों की भयावह स्थिति

कार्यक्रम के दौरान जज ने ग्रामीण भारत के सरकारी स्कूलों में फैली अव्यवस्था पर भी दुख प्रकट किया। उन्होंने एक दिल दहला देने वाली घटना का जिक्र किया, जहां एक धार्मिक संस्थान द्वारा संचालित स्कूल में सुविधाओं के घोर अभाव के चलते तीन छात्राओं को जमीन पर सोने के लिए मजबूर होना पड़ा। दुर्भाग्यवश, वहां सांप के काटने से उन तीनों बच्चियों की मृत्यु हो गई। जस्टिस वराले ने इस त्रासदी को विकास के दावों के साथ जोड़ते हुए कहा कि जहां हम अरबों रुपये बड़े आयोजनों में खर्च कर रहे हैं, वहीं हमारे बच्चे बुनियादी सुरक्षा के अभाव में जान गंवा रहे हैं।

शिक्षा बजट में ठहराव पर चिंता

जस्टिस वराले ने राज्य के समग्र शिक्षा बजट की स्थिति को भी कटघरे में खड़ा किया। उन्होंने कहा कि समय के साथ स्कूलों में छात्रों की संख्या में तो बढ़ोतरी हो रही है, लेकिन शिक्षा क्षेत्र के लिए आवंटित बजट लंबे समय से 13 फीसदी से नीचे ही बना हुआ है। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि शिक्षा को प्राथमिकता देते हुए बजट में वृद्धि की जानी चाहिए, ताकि देश का भविष्य सुरक्षित हाथों में रह सके और शिक्षा का अधिकार केवल कागजों तक सीमित न रहे।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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