बीआईटी मेसरा में सफाई का काम करती थीं रानो देवी, बिटिया आरती कुमारी ने उसी संस्थान से हासिल की पीएचडी करियर 5 घंटे पहले 3
रांची स्थित प्रतिष्ठित बीआईटी मेसरा कैंपस में बरसों तक झाड़ू लगाने वाली रानो देवी की बेटी आरती कुमारी ने उसी संस्थान से पीएचडी पूरी कर एक मिसाल कायम की है। मां के संघर्ष और बेटी की मेहनत की यह प्रेरक कहानी अब चर्चा में है।

संघर्ष की एक प्रेरणादायक दास्तां

जीवन की चुनौतियां अक्सर कठिन होती हैं, लेकिन यदि हौसले बुलंद हों, तो कोई भी बाधा बड़ी नहीं होती। झारखंड की राजधानी रांची में स्थित मशहूर शैक्षणिक संस्थान बीआईटी मेसरा से एक ऐसी ही भावुक कर देने वाली कहानी सामने आई है, जिसने सभी का दिल जीत लिया है। यह कहानी रानो देवी के अटूट संघर्ष और उनकी बेटी आरती कुमारी की कड़ी मेहनत की है। जिस संस्थान के गलियारों में रानो देवी ने दो दशक से भी अधिक समय तक सफाई का कार्य किया, उसी जगह ने उनकी बेटी को डॉक्टरेट की उपाधि देकर गौरवान्वित किया है।

महज 400 रुपये से शुरू हुआ था सफर

रानो देवी के जीवन का सफर बेहद कठिन परिस्थितियों से भरा रहा है। उन्होंने बीआईटी मेसरा के कैंपस में एक सफाई कर्मचारी के रूप में काम करना शुरू किया था। उस समय उनकी मेहनत का फल बहुत कम था और उन्हें मात्र 400 रुपये प्रति सप्ताह मजदूरी के तौर पर मिलते थे। इतने कम पैसों में अपने परिवार का भरण-पोषण करना उनके लिए एक बड़ी चुनौती थी। दुर्भाग्यवश, समय ने उनके सामने और भी बड़ी मुश्किलें खड़ी कर दीं जब उनके पति का निधन हो गया। पति की मौत के बाद 3 बच्चों की पूरी जिम्मेदारी अकेले रानो देवी के कंधों पर आ गई। उन्होंने समाज की कटु टिप्पणियों और आर्थिक तंगी का सामना किया, लेकिन कभी अपने बच्चों की शिक्षा के साथ समझौता नहीं किया। आज उनकी मेहनत का ही नतीजा है कि उनका वेतन बढ़कर 15000 रुपये महीना तक पहुंच गया है, लेकिन उनके असली गहने उनके बच्चों की सफलताएं हैं।

बेटी की जिद और मां की तपस्या

आरती कुमारी ने अपनी मां को दिन-रात कड़ी मेहनत करते हुए देखा था। वह बहुत करीब से जानती थीं कि उनकी मां ने उन्हें पढ़ाने के लिए किन-किन मुश्किलों का सामना किया है। मां के इसी त्याग और संघर्ष को आरती ने अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाया। उन्होंने अपनी पढ़ाई में कभी कोई कमी नहीं छोड़ी। उन्होंने बीटेक की डिग्री हासिल की और उसके बाद उच्च शिक्षा के लिए उसी बीआईटी मेसरा कैंपस का रुख किया, जहां उनकी मां ने अपनी जिंदगी के कई साल बिताए थे। आरती ने यहां से एमटेक किया और फिर इंजीनियरिंग के क्षेत्र में पीएचडी की पढ़ाई सफलतापूर्वक पूरी की। इस दौरान उन्हें कुछ स्कॉलरशिप्स से भी मदद मिली, लेकिन उनकी इस उपलब्धि के पीछे सबसे बड़ी भूमिका उनकी अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति और लगन की थी।

गांव का नाम किया रोशन

आरती कुमारी का ताल्लुक झारखंड के एक छोटे से गांव तुरुप (Turup) से है। उन्होंने एक ऐसा मुकाम हासिल किया है जो उनके गांव के लिए बेहद गौरव की बात है। आरती अपने गांव की पहली ऐसी महिला बन गई हैं जिन्होंने इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्र में पीएचडी की डिग्री प्राप्त की है। आज जिस कॉरिडोर और कैंपस में रानो देवी ने 26 साल तक झाड़ू-पोछा लगाकर अपना पसीना बहाया, उसी संस्थान ने उनकी बेटी को डॉ. आरती कुमारी के रूप में एक नई और सम्मानजनक पहचान दी है। मां-बेटी की यह सफलता की कहानी साबित करती है कि यदि एक मां सही परवरिश और त्याग करे, तो वह न केवल अपने परिवार की, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की पूरी तकदीर बदलने की क्षमता रखती है। यह कहानी आज के उन तमाम युवाओं के लिए एक बड़ा संदेश है जो छोटी-मोटी मुश्किलों के सामने घुटने टेक देते हैं।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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