नोबेल प्राइज जीतने के बाद भी नहीं बदली दिनचर्या, बच्चों का लंच बनाकर साइकिल से यूनिवर्सिटी पहुंचे कार्ल डिजायरोथ करियर 8 घंटे पहले 3
स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर कार्ल डिजायरोथ को 2026 के मेडिसिन नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया है। दुनिया के इस सबसे बड़े सम्मान के ऐलान के बाद जश्न मनाने के बजाय उन्होंने अपनी रोजमर्रा की पारिवारिक जिम्मेदारियों को प्राथमिकता दी और बच्चों के लिए लंच तैयार किया।

दुनिया के सबसे बड़े सम्मान के बाद भी सादगी बरकरार

दुनिया में नोबेल पुरस्कार को किसी भी वैज्ञानिक के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि और जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। लेकिन अमेरिका की प्रतिष्ठित स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर कार्ल डिजायरोथ ने यह साबित कर दिया है कि बड़ी से बड़ी वैश्विक पहचान भी एक पिता की दैनिक जिम्मेदारियों से ऊपर नहीं है। हाल ही में जब 2026 के मेडिसिन नोबेल पुरस्कार की घोषणा हुई, तो हर तरफ जश्न का माहौल होना स्वाभाविक था। हालांकि, प्रोफेसर कार्ल ने पुरस्कार मिलने की खबर मिलने के तुरंत बाद वह किया, जिसकी कल्पना करना भी आम लोगों के लिए मुश्किल है। उन्होंने किसी भी वीआईपी जश्न या इंटरव्यू को प्राथमिकता देने के बजाय अपने बच्चों के लिए स्कूल का लंच तैयार करने का काम किया। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा सोशल मीडिया पर साझा किया गया उनका यह सादगी भरा वीडियो पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बन गया है।

सोशल मीडिया पर वायरल हुआ पिता का यह अंदाज

इस पूरे घटनाक्रम का एक भावुक वीडियो सोशल मीडिया पर काफी तेजी से प्रसारित हो रहा है। वीडियो को 'न्यू नोबेल लॉरिएट, सेम स्कूल लंच ड्यूटी' जैसे कैप्शन के साथ शेयर किया जा रहा है, जो यह दर्शाता है कि दुनिया भर की शोहरत के बीच भी पारिवारिक प्रेम और बच्चों की छोटी-छोटी खुशियां सबसे ज्यादा मायने रखती हैं। वीडियो में प्रोफेसर कार्ल डिजायरोथ को अपने बच्चों के साथ इस ऐतिहासिक उपलब्धि की जानकारी साझा करते हुए देखा जा सकता है। उन्होंने कोई दिखावा नहीं किया और अपने दैनिक कार्यों में पूरी तरह लगे रहे। उनके इस विनम्र व्यवहार ने साबित कर दिया है कि असली सफलता वह है जो व्यक्ति को जमीन से जोड़े रखती है।

बच्चों की प्रतिक्रिया और पारिवारिक पल

प्रोफेसर कार्ल डिजायरोथ ने जब अपने बच्चों को इस खुशखबरी के बारे में बताया, तो उनके घर में खुशी का माहौल छा गया। वीडियो में उनकी 10 साल की बेटी सोफिया और 13 साल की बेटी एम्मा खुशी से झूमती और अपने पिता को गले लगाती नजर आती हैं। वहीं, 16 साल के बेटे हडसन ने भी प्यार से अपने पिता को गले लगाकर बधाई दी, जबकि उनका सबसे बड़ा बेटा अलेक्जेंडर उस समय अपनी यूनिवर्सिटी में व्यस्त था। इन बच्चों के लिए नोबेल पुरस्कार का जश्न अपने पिता के साथ बिताए गए इसी खास और साधारण पल में छिपा था।

नहीं छोड़ी पेरेंटिंग की जिम्मेदारी

दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार के ऐलान के ठीक बाद भी, कार्ल डिजायरोथ ने एक सामान्य पिता की तरह अपना कर्तव्य निभाया। कैमरों की चकाचौंध और बधाई संदेशों के ढेर को दरकिनार कर, उन्होंने सबसे पहले वही काम किया जो दुनिया भर के लाखों अभिभावक रोज सुबह करते हैं। उन्होंने अपने बच्चों के लिए टिफिन पैक किए और अपने हाथों से उनके लिए सैंडविच तैयार किए। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के आधिकारिक पेज से इस दृश्य को साझा करते हुए बहुत ही मार्मिक कैप्शन दिया गया है कि नोबेल विजेता नया है, लेकिन स्कूल लंच की ड्यूटी वही पुरानी है। यह दृश्य बताता है कि एक बड़े वैज्ञानिक होने के साथ-साथ अपनी पेरेंटिंग ड्यूटी को जारी रखना उनके लिए कितना महत्वपूर्ण है।

ऑप्टोजेनेटिक्स तकनीक की महान खोज

प्रोफेसर कार्ल डिजायरोथ स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में बायोइंजीनियरिंग, मनोरोग विज्ञान और व्यवहार विज्ञान के प्रोफेसर हैं। उन्हें यह प्रतिष्ठित सम्मान जर्मनी के वैज्ञानिक पीटर हेगेमैन और जॉर्जी नागेल के साथ संयुक्त रूप से मिला है। इन तीनों वैज्ञानिकों को ऑप्टोजेनेटिक्स तकनीक की खोज के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। यह तकनीक चिकित्सा विज्ञान के लिए एक क्रांतिकारी कदम है, जिसके माध्यम से वैज्ञानिक रोशनी का उपयोग करके जीवित मस्तिष्क के भीतर विशिष्ट तंत्रिका कोशिकाओं की गतिविधियों को नियंत्रित कर सकते हैं। इस खोज से वैज्ञानिकों को मस्तिष्क के सर्किट को बारीकी से समझने और उनके कामकाज का अध्ययन करने में अभूतपूर्व मदद मिली है।

लेखन से न्यूरोसाइंस तक का सफर

प्रोफेसर कार्ल डिजायरोथ की जीवन यात्रा भी काफी प्रेरणादायक है। एक वैज्ञानिक परिवार में जन्मे कार्ल का शुरुआती झुकाव लेखन और साहित्य की ओर था। वह अपने शुरुआती दिनों में न्यूरोसर्जरी के क्षेत्र में करियर बनाना चाहते थे, लेकिन स्टैनफोर्ड मेडिसिन में अपने मनोरोग विज्ञान रोटेशन के दौरान मरीजों के साथ समय बिताने के बाद उन्होंने इस क्षेत्र को अपना लक्ष्य बना लिया। आज उनकी यह खोज चिकित्सा के इतिहास में मील का पत्थर साबित हो चुकी है, लेकिन उनका पारिवारिक जीवन और विनम्रता यह स्पष्ट करती है कि व्यक्ति कितनी भी ऊंचाइयों पर क्यों न पहुंच जाए, उसे अपनी जड़ों और अपनों के साथ जुड़ाव बनाए रखना चाहिए।

करण मल्होत्रा पाबना के अंतरराष्ट्रीय संवाददाता हैं, जो अमेरिका, यूरोप और एशिया की खबरें रिपोर्ट करते हैं। वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और बड़े अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर वे नजर रखते हैं। उनकी रिपोर्ट्स दुनिया की हलचल को पाठकों तक तेजी से पहुंचाती हैं।

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